Friday, June 25, 2010

हिंदू संत धारा को जानें

हिंदू संत धारा को जानें

 

वर्तमान दौर में अधिकतर नकली और ढोंगी संतों और कथा वाचकों की फौज खड़ी हो गई है और हिंदुजन भी हर किसी को अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा लेकर उसका बड़ा-सा फोटो घर में लगाकर उसकी पूजा करता है। उसका नाम या फोटो जड़ित लाकेट गले में पहनता है। यह धर्म का अपमान और पतन ही माना जाएगा।

हिंदू संत बनना बहुत कठिन हैक्योंकि संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब ही उसे शैव या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है। इस कठिनाई, अकर्मण्यता और व्यापारवाद के चलते ही कई लोग स्वयंभू साधु और संत कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो चले हैं। इन्हीं नकली साधु्ओं के कारण हिंदू समाज लगातार बदनाम और भ्रमित भी होता रहा है। हालाँकि इनमें से कमतर ही सच्चे संत होते हैं।

हिंदू संन्यास की कुछ पद्धतियाँ है। इन पद्धतियों के सम्प्रदायों मेंदीक्षित व्यक्ति को ही हिंदुओं का संत माना जाता है। इस संन्यास परम्परा से जो बाहर है वे संत जरूर हो सकते हैं, लेकिन हिंदू संत नहीं। इस संत धारा से जो बाहर है उनमें से ज्यादातर ने हिंदू धर्म की मनमानी व्याखाएँ करके अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर रखी है और यह भी कि उन्होंने हिंदुजन को भरमाकर उनका शोषण कर स्वयं के धार्मिक व्यापार को विस्तार दिया है।

स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने वालों में जैसे संत आसाराम, दादा लेखराज, सत्यसाँई बाबा, महर्षि महेष योगी, श्रीराम शर्मा आचार्य, श्रीश्री रविशंकर आदि असंख्य लोग हैं। इनमें कौन सही और कौन गलत है यह तो जनता ही तय करती है।

हिंदू संत समाज तीन भागों में विभाजित है और इस विभाजन का कारण आस्था और साधना पद्धतियाँ हैं, लेकिन तीनों ही सम्प्रदाय वेद और वेदांत पर एकमत है। यह तीन सम्प्रदाय है- A. वैष्णव B.शैव औरC.स्मृति। वैष्णवों के अंतर्गत अनेक उप संप्रदाय है जैसे वल्लभ, रामानंद आदि। शैव के अंतर्गत भी कई उप संप्रदाय हैं जैसे दसनामी, नाथ, शाक्त आदि। शैव संप्रदाय से जगद्गुरु पद पर विराजमान करते समय शंकराचार्य और वैष्वणव मत पर विराजमान करते समय रामानंदाचार्य की पदवी दी जाती है। हालाँकि उक्त पदवियों से पूर्व अन्य पदवियाँ प्रचलन में थी।

A) शैव संप्रदाय :
शिव को मानने वाले शैव संप्रदाय वाले हैं। शैव परंपरा के अनेक संप्रदाय हैं। इनमें शैव, पाशुपत, वीरशैव, कालामुख, कापालिक, काश्मीर शैव मत तथा दक्षिणी मत और दसनामी अधिक प्रसिद्ध हैं। शाक्त और नाथ संप्रदाय भी शैव संप्रदाय का ही अंग है। सभी में दसनामी संप्रदाय ही अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध है। शाक्त और नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति तो शैव और वैष्णव संप्रदाय में समन्वय की भावना से हुई थी।

*दसनामी संप्रदाय :
हिंदू संन्यास की दसनामी पद्धतियों में से किसी एक पद्धति में हिंदू व्यक्ति जब संन्यास लेता है तो उसको नया नाम दिया जाता है। नए नाम के आगे स्वामी और नाम के साथ आनंद जुड़ा होता है अंत में जिस भी पद्धति से संन्यास लिया है उसका नाम होता है। जैसे कि स्वामी अवधेशानंद गिरि- इसमें 'स्वामी' स्वयं के मालिक होने का सूचक है जो सभी दसनामी संतों के नाम के पूर्व जोड़ा जाता है अवधेशानंद में से 'अवधेश' व्यक्ति को दिया गया नाम है जिसमें 'आनंद' जोड़ा जाता है जोकि सभी संतों के नाम के बाद जोड़ा जाता है। अंत में 'गिरि' दसनामी सम्प्रदायों में से एक संप्रदाय का नाम 

है।



इसी तरह नाथ शब्द का उपयोग भी वही कर सकता है जो कि हिंदू संन्यास पद्धति से दीक्षित हुआ है। अन्य किसी को भी इन शब्दों का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है, लेकिन मनमानी स्वतंत्रता और राजनीतिज्ञ संवरक्षण के चलते हर कोई स्वामी, आचार्य और आनंद शब्द का इस्तेमाल कर लेता है। जो जानकार है वे जानबूझ कर भी उक्त शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन जिसे हिंदू धर्म की परवाह नहीं है वे ही ऐसा करते हैं।

*संत नाम विशेषण और प्रत्यय : परमहंस, महर्षि, ऋषि, स्वामी, आचार्य, महंत, संन्यासी, नाथ और आनंद आदि। 
*दसनामी संप्रदाय : गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम।

*दसनामी पद्धति :
शंकराचार्य से सन्यासियों के दसनामी सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ। इनके चार प्रमुख शिष्य थे और उन चारों के कुल मिलाकर दस शिष्य हए। इन दसों के नाम से सन्यासियों की दस पद्धतियाँ विकसित हुई। यह भारत के दस भाग का हिस्सा भी है। शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे जो दस क्षेत्रों में बँटें थे जिनके एक एक मठाधीश थे।

दसनामी व्यक्तित्व : दसनामी सम्प्रदाय के साधु प्रायः गेरुआ वस्त्र पहनते, एक भुजवाली लाठी रखते और गले में चौवन रुद्राक्षों की माला पहनते हैं। हर सुबह वे ललाट पर राख से तीन या दो क्षैतिज रेखाएँ बना लेते। तीन रेखाएँ शिव के त्रिशूल का प्रतीक होती है, दो रेखाओं के साथ एक बिन्दी ऊपर या नीचे बनाते, जो शिवलिंग का प्रतीक होती है। इनमें निर्वस्त्रधारियों को नगा बाबा कहते हैं। दसनामी संत 'नमो नारायण' या 'नम: शिवाय' से शिव की आराधना करते हैं।

नाथ सम्प्रदाय : प्राचीन काल से चले रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरख नाथ ने पहली दफे व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रुप में जाना जाता है। इन्हीं से आगे चलकर चौरासी और नवनाथ माने गए जो निम्न हैं:- 

नाथ व्यक्ति : परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं।

इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर 'आदेश' या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें बैरागी, उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते है.

 

प्रारम्भिक दस नाथ:
आदिनाथ, आनंदिनाथ, करालानाथ, विकरालानाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूतनाथ, वीरनाथ और श्रीकांथनाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ, वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुन नाथ।

चौरासी और नौ नाथ परम्परा : आठवी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के महायान के वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे। सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे। उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है। 

नौ नाथ गुरु : 1.मच्छेंद्रनाथ 2.गोरखनाथ 3.जालंधरनाथ 4.नागेश नाथ 5.भारती नाथ 6.चर्पटी नाथ 7.कनीफ नाथ 8.गेहनी नाथ 9.रेवन नाथ। इसके अलावा ये भी हैं: 1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3. गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ 8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ 12.रामचंद्रनाथ।

ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ, दादाधूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और साईं बाब को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं।

B) वैष्णव संप्रदाय : 
वैष्णव भगवान विष्णु और उनके अवतारों को मानने वालों का संप्रदाय है। इसे भागवत संप्रदाय भी कहते हैं। मुख्यत: ईश्वर के अलावा ये लोग, विष्णु, राम और कृष्ण के भक्त होते हैं। इसलिए इसके मुख्यत: तीन विभाजन है कृष्णनामी, रामनामी और नारायण। इनका मूल जाप मंत्र है: 'श्रीमन नारायण, नायायण हरि हरि। भजमन नारायण नारायण हरि हरि' और इसके अलावा ये 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी जाप करते हैं।

वैष्णव संप्रदाय के संतों के नाम के आगे महर्षि या स्वामी और नाम के अंत में आचार्य का प्रयोग होता है, जैसे महर्षि वल्लभाचार्य और स्वामी रामानंदाचार्य। वैष्णव सम्प्रदाय के अनेकों उप संप्रदाय भी हो चले हैं उनमें प्रमुख हैं- 1.वल्लभ 2.रामानंद 3.माधव 4.बैरागी, 5.दास 6.निम्बार्क, 7.गौड़ीय, 8.श्री संप्रदाय आदि। इसमें बैरागी और रामानंद का संप्रदाय ही अधिक प्रसिद्ध है।

विष्णु के भक्त श्वेत वस्त्र पहनते, सिर मुँड़ाकर रखते, जबकि दसनामी जटाएँ धारण करते हैं। दसनामियों की तरह वैष्णवों के भी कई मठ है। सीता और राम के भक्त तुलसी के 108 मनकों की अपनी माला, तीन कोनों वाली लाठी और ललाट पर दो सफेद और एक ऊर्ध्वाकार धारियों से पहचाने जाते हैं। राधाकृष्ण के भक्त ललाट पर नाल के आकार की सफेद या काली धारी बनाते थे और गले में एक ही तुलसी की माला पहनते थे।

शैव और वैष्णवों के प्रमुख अखाड़े : जूना अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा, आह्वान अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा एवं अटल अखाड़ा। वैष्णवों में बैरागी, उदासीन, रामादंन और निर्मल अखाड़ा।

दर्जा : हर मठ, अणि, नाथ के अनुयायियों के बीच प्रत्येक साधु को उसकी आध्यात्मिक उपलब्धियों के मुताबिक दर्जा प्राप्त है। नौसिखुआ से लेकर अवधूत और परमहंस तक। पूरे देश में मुश्किल से 10 या 12 परमहंस होंगे। पिछले सौ वर्षों में सबसे महान परमहंस थे दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण। परमहंस से ऊपर भगवान होते हैं। भगवान से ऊपर ईश्वर की सत्ता मानी गई है।

C). स्मृति आधारित संप्रदाय : जो सिर्फ एक निराकार परमेश्वर को ही मानकर उन्हीं की आराधना या स्मरण करता है तथा सभी तरह के वैदिक नियमों को मानता है उसे स्मृति आधारित संप्रदाय के अंतर्गत माना जाता है। इस संप्रदाय के भी अनेकों उप संप्रदाय है। यहाँ स्मृति आधारित संप्रदाय लिखने का उद्‍येश्य है कि उक्त दो संप्रदायों से अलग जो संप्रदाय है वे इसी के अंतर्गत मान लिए जाते हैं।

शिवराज्याभिषेक राष्ट्रीय सण

शिवराज्याभिषेक राष्ट्रीय सण

तिथीनुसार येणारा शिवराज्याभिषेकाचा सोहळा पुढील वषीर् रायगडावर राष्ट्रीय सण म्हणून सरकारतफेर् साजरा केला जाईल, अशी घोषणा अर्थमंत्री सुनील तटकरे यांनी केली. प्रख्यात कला दिग्दर्शक नितीन देसाई यांच्या शिवरायांवरील मालिकेच्या डीव्हीडीच्या प्रकाशनानिमित्त आयोजित कार्यक्रमात त्यांनी ही घोषणा केली. रायगडाच्या पायथ्याशी सरकार शिवसृष्टी साकारणार असून त्यासाठी देसाई यांनी सहकार्य करावे, असे आवाहनही त्यांनी केले. 

राजा शिवछत्रपती या मालिकेच्या १६ भागांच्या डीव्हीडी संचाच्या प्रकाशनासाठी गुरुवारी बीकेसीच्या एमसीए क्लबमध्ये शानदार कार्यक्रम आयोजित करण्यात आला होता. यावेळी सुनील तटकरे, शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे, मनसेचे अध्यक्ष राज ठाकरे, दिग्दर्शक आशुतोष गोवारीकर, मधुर भांडारकर, राजकुमार हिराणी, केतन मेहता, अमोल कोल्हे, शमिर्ला ठाकरे उपस्थित होते. 

महाराजांची वेशभूषा करणे अयोग्य 

राज ठाकरे यांनी भाषणात शिवाजी महाराजांचे नाव येणाऱ्या प्रत्येक पिढीला ठावूक असले पाहिजे, त्यादृष्टीने त्यांचा जीवनपट तयार झाला पाहिजे, असे सांगितले. शिवजयंतीप्रसंगी निघणाऱ्या मिरवणुकांमध्ये महाराजांसारखी वेशभुषा करून कुणाला तरी घोड्यावर बसवले जाते, हे योग्य नाही. त्यामुळे महाराजांची विटंबना होते, त्यामुळे असले प्रकार थांबले पाहिजे, असे ते म्हणाले. 

शिवरायांवर केवळ ५० हजार पानेच 

महाराजांच्या जीवनावर आपल्याकडे विपुल लेखन झाले नाही, गंथसंपदा नाही. नेपोलियनच्या जीवनावर दोन लाखांहून अधिक पुस्तके आहेत. पण महाराजांच्या आयुष्यावर ५० हजार पानेच असतील, अशी खंत बाबासाहेबांनी व्यक्त के

३१ वर्षांनंतर 'हिंदू' बाजारात

३१ वर्षांनंतर 'हिंदू' बाजारात


राजकीय पक्षांनी हिंदुत्वाचा चुकीचा अर्थ लावल्याने आपलं खूप मोठं नुकसान झालंय. शेजारी एखादा मुसलमान वा शीख आला तरच आपलं हिंदुत्व जागृत होतं, हे चूक आहे. भाजपसारख्या पक्षाने किंवा संघासारख्या संघटनेने हिंदुत्वाचा केवळ राजकीय दृष्टिकोनातून आणि तोही अत्यंत संकुचित असा अर्थ लावला. त्याचं सांस्कृतिक अंग त्यांना कळलंच नाही. काँग्रेस व इतर पक्षांनाही हिंदुत्वाची व्याख्या करता आली नाही. म्हणूनच रूढी, परंपरा, श्ाद्धा-अंधश्रद्धा, चालीरीती, कुटुंब व्यवस्था, नातेसंबंध या सगळ्यांचा मिळून बनलेला हिंदू संस्कृतीचा पसारा समजून घेणं, वाचकांपर्यंत पोहोचवणं या गरजेतून हे कादंबरी चातुष्ट्य आकाराला आलंय... 

रा. रा. भालचंद नेमाडे 'पॉप्युलर प्रकाशना'च्या कार्यालयात 'हिंदू' कादंबरीसंदर्भातल्या पत्रकार परिषदेत बसून अथक बोलत असतात. गेल्या काही दिवसांत ते मुलाखतींवर मुलाखती देत आहेत आणि तरीही त्यांचा उत्साह टिकून आहे. कारण तब्बल ३१ वर्षांच्या 'प्रेग्नंट पॉज'नंतर त्यांची 'हिंदू : जगण्याची समृद्ध अडगळ' ही सव्वासहाशे पानांची कादंबरी छापून तयार आहे आणि येत्या १५ जुलैला ती बाजारात येणार आहे. १९६३ साली 'कोसला'ने मिरॅकल केल्यानंतर 'बिढार' ते 'झूल' या चांगदेव चतुष्ट्याने आणि देशीवादाच्या मांडणीने भालचंद नेमाडे नावाची जितीजागती मिथ मराठी साहित्यात तयार झाली. त्यामुळे ७९ मध्ये प्रसिद्ध झालेल्या 'झूल'नंतर नेमाड्यांच्या 'हिंदू'च्या घोषणेने मराठी वाचकांची नव्या कादंबरीसाठी प्रतीक्षा सुरू झाली. परंतु एका कादंबरीत आटोपणारा हा प्रपंच काळाच्या ओघात विस्तारत गेला आणि त्याचं अडीच हजार पानांच्या 'हिंदू चतुष्ट्या'त रूपांतर झालं. 

इंग्लंडमध्ये असताना तिथे भारतीय-पाकिस्तानी लोकांचा वेगळा हिंदूसमूह असल्याचं माझ्या लक्षात आलं आणि तिथेच या कादंबरीचं बीज मनात रूजलं... नेमाडे सांगतात आणि त्याचवेळी, हिंदूंची ग्रामीण व्यवस्था, नागरी व्यवस्था, नंतरच्या शहरीकरणाच्या समस्या, अनिवासी भारतीयांच्या समस्या यांचं कादंबरीतलं दर्शन वाचून आज जे सभोवताली चाललंय त्याची व्यवस्था कशी लावता येईल, हिंदू समाजातील जातीची उभी उतरंड आडवी कशी करता येईल, हे वाचकांच्या डोक्यात यावं अशी माझी अपेक्षा आहे, असंही स्पष्टपणे नोंदवतात. 

केमिकलने फळे पिकवल्यास तुरुंगवास

केमिकलने फळे पिकवल्यास तुरुंगवास

रसायने वापरून फळे पिकवणा-यांना तुरुंगवास आणि दंड अशी शिक्षा ठोठावण्याचा सरकार विचार करत आहे. 

फळे खाल्याने आरोग्य सुधारते असे डॉक्टर सांगतात. त्यात डॉक्टरांना नैसर्गिक फळे अपेक्षित आहेत. पण रसायने वापरून पिकवलेली फळे खाल्याने आरोग्य बिघडते असे आता संशोधनातून दिसले आहे. 

आंबा, केळी, पपई, सफरचंद, द्राक्ष अशी फळे हल्ली सर्रास रसायनांचा वापर करून पिकवली जातात. माल झटपट तयार व्हावा आणि बाजारात विकाला जावा असा हिशेब अनेक शेतकरी आणि व्यापारी करतात. असे करताना आपण ग्राहकाला वारंवार डॉक्टरकडे पाठवतो याची त्यांना कल्पना असली तरी पैशाच्या आशेने ते हा मार्ग पत्करतात. 

ही प्रवृत्ती रोखण्यासाठी आता केंद्र सरकारने कायदा करायचे ठरवले असून असा 'गंदा धंदा' करणा-या व्यापा-यांना आणि शेतक-यांना सहा महिन्याचा तुरुंगवास आणि एक हजार रूपये दंड अशा शिक्षेची यात तरतूद आहे. 

भारतीय शेतक-यांनी आणि व्यापा-यांनी रसायनांचा वापर थांबवला तर परदेशी बाजारपेठेत भारतीय फळे अधिक विकली जातील असे शेतीतज्ज्ञ सांगतात. अनेक देशांत भारतीय फळे, भाज्या यांची कसून तपासणी केल्याशिवाय त्यांना प्रवेश दिला जात नाही. यामुळे भारतीय शेतकरी आणि व्यापार यांचे मोठ्या प्रमाणावार आर्थिक नुकसान होते असेही हे तज्ज्ञ सांगतात.

Canara Bank Recruitment of Investment Officers On Contract Basis

Canara Bank Recruitment of Investment Officers On Contract Basis

canara bank recruitment

Canara Bank has recently published an advertisement for the recruitment of investment officers on contract basis. The last date to apply these jobs in Canara bank is 10th july, 2010. The opening date of registration for application is 22nd june, 2010. Eligible candidates are requested to apply ON-LINE through Bank's website of canara bank. No other means / mode of Application will be accepted. See the following detail to apply Canara bank recruitment.

Canara Bank Recruitment Detail

Investment Officers

  • No. of vacancies: 700 posts
  • Salary-Rs.15000/- per month subject to achievement of minimum threshold premium of Rs.1 lakh per month i.e., Rs.12 lakhs per annam

Read more:Canara Bank Recruitment Detail

Bad governance:India is among 13 corrupt nations - Poor Performance

Bad governance:India is among 13 corrupt nations

New report states that common drugs were not available in clinics for six to eight months and doctors were not available for 37% of the time

 

 

London: India is among thirteen countries that have been declared to have a high level of corruption and abysmal government performance.
According to the report prepared by the Washington based Results for Development Institute (R4D), Guatemala, Paraguay, Ghana, Kenya, Peru, Argentina, Russia, Romania, Albania, Moldova, Poland, and Indonesia are the other countries that were listed for review and assessment on these two counts.
As far as India was concerned, the report based its assessment on two districts in the state of Karnataka, which has a population of 53 million.
It quoted the Indo-Dutch project management society (IDPMS) as saying that it found that 24% of all positions were vacant at public health centres, including half of the pharmacy jobs.
They also found that common drugs were not available in health clinics for six to eight months at a time, and doctors were not available for 37% of the time during clinic hours.
In some cases, the investigators said, unqualified people were disbursing drugs because no pharmacist was available.
The report, From the Ground Up, which was published by the Brookings institution press, documents a growing phenomenon of watchdog groups in developing countries examining key issues in government performance, seizing a role that has long been delegated to Western institutions and a cadre of outside consultants.
Experts say the indigenous groups have the potential to do a better job than the outsiders—and cost far less.
"What these organisations are showing is that there are people on the ground in these countries who know the context better, know the schools, know the health system, and with a little outside help, they can go in and make changes happen,'' said Courtney Tolmie, a co-author of the report.
The report, released on Wednesday at the London School of Economics, documents 19 case studies and related reform advocacy by groups from 2006 to 2008.
The problem of mismanagement and corruption in young democracies has been a source of great concern among donors, governments, and obviously citizens in developing countries.
Surveys have consistently shown that in many countries more than half the people have directly experienced instances of corruption — from local policemen demanding bribes to their family doctor asking for additional fees.
In fact in Russia, extortion by officials has got so bad that some Western multinationals are considering pulling out altogether, Alexandra Wrage, head of a US anti-bribery group, TRACE International, said.


Popular Posts

Total Pageviews

Categories