Sunday, January 2, 2011

काही वाचण्यासारखे जरूर वाचा.



                     मानलेल्याना नात्याला ही पळवाट नेहमीच असते...त्यासाठीच ते  पकडून ठेवायचे असते......नात असण्यात आणि मानण्यात जमीन आसमानाचा फरक असतो....असलेल नात जड़ झाल तरी माणूस झिडकारू शकत नाही नाकारू शकत नाही...... मनातून उतरलेल्या व्यक्तिशी कोणतही नात ठेऊ नका........ अस नात फक्त त्रास देत......पण मनाने जोडलेल्या नात्याला कधीही अंतर देवू नका......... कारण ते हृदयात बसलेले असते "  

 

                       " एकवार आपण कर्ज मानल, की ते देण माणसाच कर्तव्य आहे..... नाहीतर आपल्याला ते मनात मिंदय करत...... मनात दास्य निर्माण करत ......शून्यातने मिळालेला शेवटचा रुपया ही जुगारात लावायला आवडेल...... कारण मी शुन्यातून विश्व निर्माण करू शकतो...... मग त्या रुपयातून का नाही पण हें सगळे चांगल्यासाठी .... तसं देवाने मला चांगलच "बनवल" आहे  मी देव मानतो... पण मी प्रयत्नवादी आहे. "

                 

                       "ज्याला आपली मत मांडता येत नाही त्याला मत असून नसून सारखीच!!! आपली मत मांडण्यापेक्षा दुसर्याला पटणारे विचार बोलायचे.... मग विषय संपतो ...विश्वासघात फक्त विश्वासू व्यक्तीच करू शकते..... स्वत:च्या अस्तित्वावर बेतल की, या जगात कोणी कोणाच नसत ....एक माणूस म्हणून तुम्हाला सगळे गुन्हे माफ़.... पण माणूस असाल तर..."

 

                      " वादळ कधी परवानगीची वाट पाहत दारावर थांबत का?.... संसारात आपण कोणत्या व्यक्तिबरोबर संसार करतो आहे तिला महत्त्व द्यायला हव... संसाराला नाही...... श्रद्घा प्रेम शिकवते आणि अंधश्रद्धा फक्त बळी मागते...... "निसर्गाला रंग हवा असतो, फुलानाही गंध हवा असतो, माणूस हा एकटा राहणार कसा, कारण त्यालाही मैत्रीचा छंद हवा असतो !!!!!" ....पण फसवणाऱ्या  व्यक्तिसाठी माझ्या आयुष्यात स्थान नाही....... सोय पाहून केला जातो तो व्यवहार आणि गैरसोयीतही सोय पहिली जाते ते प्रेम .....हिशोब कळतो पण किम्मत कळत नाही"

 

                     मला गाने  म्हणायला ~~~ आवडत..... पण मी गाने  म्हटलेल लोकांना आवडत नाही.... मला प्राणी आवडतात पण त्याना कैद करण आवडत नाही.....प्रत्येकाला स्वातंत्र्य दिल जाव.... कारण पकडून पकडून मैत्री करायाला आवडत नाही..... पण मैत्री केल्यावर पकडून ठेवायला आवडत "

                       जोपर्यंत मी जिंकत नाही तोपर्यंत लढाईचा शेवट होण शक्यच नाही....आयुष्यातली प्रत्येक लढाई जिंकली नसेन कदाचित.... पण लढली जरुर आहे  ...  "या जन्मावर.. या जगण्यावर शतदा प्रेम करावे...!!" आणि हेच जगणे आनंदी करणारी काही नाती माझ्या आयुष्यात महत्वाची आहेतआयुष्यातील चांगुलपणावर विश्वास. खोटेपणा, वाईट वृत्ती, माणंस यांचा तिरस्कार..!! नशीबावर विश्वास नाही.....आयुष्य तुम्हाला ज्या मार्गाने नेत असेल त्या मार्गाने जाऊ नका. तर तुम्हाला ज्या मार्गाने जायचे असेल त्या मार्गाने आयुष्याला न्या "

 

                      मी कधीच कोणती गोष्ट अर्धवट सोडत नाही..... चांगल किंवा वाईट झाल तरी त्याच खर कारण शोधून काढतो..... मी माझा कोणताच निर्णय नियतिवर सोडत नाही........ मला आयुष्यात जगताना धेय्य, तत्वांशी तडजोड मान्यच नाही...... कारण पर्याय ठेवून जगणारा मी नव्हे."

 

                      "येणार्या सर्व आव्हांनासाठी सज्ज रहात्यांना खंबीर मनाने सामोरे जाऐरण झालास तर घाव सोसहातोडा झालास तर घाव घाल". सध्यातरी आयुष्य असंच आहे....!! (.पी.जे. अब्दुल कलाम)

                      " एखाद्या नात्यामध्ये यशस्वी होण्याची गुरुकिल्ली - जीवनसाथी म्हणून योग्य व्यक्ती निवडणे 




Saturday, January 1, 2011

भारत के रोचक तथ्यों II




4) भारत में 970,000 स्कूल हैं, जबकि चीन में 1,800,000 स्कूल हैं |

5) भारत मैं मात्र 6% छात्र 10+2 (शिक्षा की नियंत्रण रेखा) को पार कर
पाते हैं | इनमें से भी अधिकतर ऐसे डिग्री कोर्स की पढ़ाई करते हैं जिनका
आज के दौर में, रोजगार के अवसर पैदा करने, राज्य की अर्थव्यवस्था को
बढ़ाने में कोई योगदान नहीं है |

6) देश के सभी 15,600 कालिज के कुल डिग्री धारकों में 72% आर्टस विषय
वाले हैं | मात्र 28% छात्र विज्ञान, कामर्स, मैनेजमेंट, इन्फोर्मेशन
टेक्नोलॉजी, कानून, मेडिकल, इंजीनियरिंग जैसे खास विषय पढ़ते हैं |

7) हमारे पास 372 विश्वविद्यालय हैं | चीन के पास 900 और जापान के पास 4000 हैं |

8) शेष विश्व में 15 से 35 साल उम्र के बीच के 95% युवा, 2500 विषयों में
से, वोकेशनल शिक्षा और ट्रेनिंग (VET) कार्यक्रम के द्वारा शिक्षा
प्राप्त करते हैं और खास विषयों के माहिर बनते हैं | भारत में अभी तक
केवल 71 विषयों की ही पहचान की गई है | आज़ादी के 60 सालों बाद भी
मुश्किल से 2% आबादी ही, वोकेशनल शिक्षा और ट्रेनिंग (VET) कार्यक्रम के
द्वारा ट्रेनिंग हासिल करती है |

9) हमारे पास 11,000 आईटीआई और VET स्कूल हैं | चीन के पास 500,000 सीन.
सेक. वोकेशनल शिक्षा और ट्रेनिंग (VET) स्कूल हैं |

10) भारत के पास अन्तराष्ट्रीय स्तर के इंजिनीयर्स, मैनेजमेंट विशेषज्ञ
हैं, लेकिन अन्तराष्ट्रीय स्तर के ड्राईवर, कारपेंटर, मैकनिक इत्यादि
नहीं हैं |

11) एक अपवाद के रूप में केवल इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेर ही ऐसे
क्षेत्र हैं जहाँ हमारे पास भारी संख्या में विशेषज्ञ मौजूद हैं | यह
सारे भारत में फैले 50,000 से ज्यादा सरकारी और गैर सरकारी ट्रेनिंग
सेंटर्स की वजह से है |

12) I.T. और सॉफ्टवेर विश्व अर्थव्यवस्था का मात्र 1.5% है | इसमें भारत
का हिस्सा तक़रीबन 5% है | देश की अर्थव्यवस्था के तेज गति से विकास के
लिए, और रोजगार के नए अवसरों के लिए हमें बाकि 95% की तरफ़ ध्यान देना
होगा और इसे विश्व स्तरीय बनाना होगा |

13) अनुमानित 30 करोड़ भारतीय या तो बेरोजगार हैं या नौकरी पाने योग्य
उम्र में हैं | इनमें से केवल 4.5 करोड़ ने ही रोजगार केन्द्रों में नाम
लिखवाया है | इन को भी रोजगार हासिल होने की ज्यादा उम्मीद नहीं है |

14) जितने भी रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं, उनमें से 1% सरकारी, और
2% नियोजित क्षेत्र से हैं | बाकि 97% असंगठित क्षेत्र से हैं |

15) 43 करोड़ काम करने लायक भारतियों में से 94% असंगठित क्षेत्र में काम
करते हैं | केवल 6% ही संगठित क्षेत्र में काम करते हैं |

16) कुल जनसंख्या का 1.7% यानि 1.8 करोड़ लोग केन्द्र तथा राज्य सरकारों
के लिए काम करते हैं | अनुमानित 90 लाख लोग संगठित निजी क्षेत्र में काम
करते हैं | जो की कुल जनसँख्या का 2.6% है |

17) देश के सारे श्रम कानून केवल इन 2.6% नागरिको के हितों की किसी भी
हालत में रक्षा करने के लिए बने हैं | संविधान की धारा 377 में संशोधन की
जरुरत है क्योंकि यह इन सरकारी कर्मचारिओं जरुरत से ज्यादा सरंक्षण दे
रही है, चाहे यह देश की कीमत पर ही क्यों न हो |

18) जहाँ MP's, MLA's, Municipal Councilors और गाँव पंचायत अधिकतम 5 साल
के लिए चुने जा सकते हैं, वहीं सरकारी अधिकारी और कर्मचारी, रोजगार के
लाभ सारी जिन्दगी लेते रहते हैं चाहे उनकी कार्यक्षमता कैसी भी क्यों न
हो |

19) भारत में अनुमानित 60 करोड़ लोग अनपढ़ हैं | यह अनुमान अन्तराष्ट्रीय
मानदंड पांचवी कक्षा तक शिक्षा, तथा पढने, लिखने तथा हिसाब लगाने की
क्षमता, पर आधारित हैं |

20) भारत की साक्षरता की परिभाषा है "यदि आप अपना नाम लिख सकते हैं तो आप
पड़े लिखे हैं" | किसी ने आज तक साक्षरता की इस परिभाषा को गंभीर चुनौती
नहीं दी हैं |

21) सरकारी परिभाषा के अनुसार, देश में 26 करोड़ लोग निर्धनता रेखा से
नीचे रहते हैं | प्रतिदिन 11 रु (देहाती क्षेत्र में) और 14 रु (शहरी
क्षेत्र में), जिनसे एक व्यकित नागरिक वितरण व्यवस्था से इतना अनाज खरीद
सके जिससे उसे प्रतिदिन 2,200 K कैलोरी फ़ूड वेल्लू की आपूर्ति हो सके |

22) किसी ने भी निर्धनता रेखा की इस परिभाषा को अभी तक चुनौती नहीं दी है
| हम कैसे यह मान सकते हैं कि कुछ किलो कच्चा आटा या चावल, इन्सान के
जीने के लिए काफी है ! क्या उसे जीने के लिए कुछ और नहीं चाहिए ? क्या
उसे तन ढकने के लिए कपड़ा, पैरों के लिए चप्पल, कुछ सब्जियां, दूध
इत्यादि कि जरुरत नहीं है | इस आटे या चावल को वह बिना इंधन के कैसे
पकायेगा |

23) विश्व बैंक की पुरानी परिभाषा ( 1$ USD प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन या
365$ USD सालाना ) के अनुसार अनुमानित 45 करोड़ लोग निर्धनता रेखा से
नीचे रहते हैं | विश्व बैंक की नई परिभाषा ( 2$ USD प्रति व्यक्ति,
प्रतिदिन या 730$ USD सालाना ) के अनुसार अनुमानित 70 करोड़ लोग निर्धनता
रेखा से नीचे रहते हैं |

24) भारत की प्रति व्यक्ति अनुमानित औसत आय 600$ USD सालाना है और 1.65$
USD प्रतिदिन है | ( अनुमानित 1.07 अरब लोग, और देश कि सालाना GDP 648$
बिलियन )

25) भारत की अर्थव्यवस्था, विश्व अर्थव्यवस्था का 1.72% है, जबकि भारत की
कुल आबादी विश्व की आबादी का 17% है | मांग ज्यादा है लेकिन, खरीदने की
क्षमता कम है | इसलिए हमें अपनी एक्सपोर्ट से सम्बंधित गतिविधिओं को 10
गुना बढ़ाना होगा | विश्व बाज़ार भारतीय बाज़ार से 60 गुना ज्यादा बड़े
हैं | विश्व व्यापार में हमारा हिस्सा केवल 0.8% है | यह 1,000 साल पहले
की स्थिति से 33% कम है, अंग्रजों के भारत आने के वक्त से 27% कम है, और
1947 से 3% कम है |

26) केवल 5% भारतीय अंग्रेज़ी भाषा समझ सकते हैं फिर भी, भारत सरकार,
राज्य सरकारों और नागरिक संस्थाओं की अधिकतर वेबसाइट्स अंग्रेज़ी भाषा
में हैं |

27) अंग्रेज़ी भाषा जिन देशों में इस्तेमाल की जाती है उनका विश्व
अर्थव्यवस्था का हिस्सा 40% है, जैसे की अमेरिका, इंग्लैंड और उसके
पुराने शाशित देश | शेष विश्व का हिस्सा 60% है फिर भी हम अन्य भाषाऔं
जैसे फ्रेंच, जर्मन, जापानी, चीनी आदि को सीखने के किए कुछ खास नहीं कर
रहे हैं | चीन इस मामले में हमसे काफी आगे है |

28) यदि हम नागरिक विकास इंडेक्स के हिसाब से बात करें (नवजात शिशुओं की
मृत्यु दर, बच्चों की देखभाल, कुपोषण, स्त्रीयों की सेहत, रोग, सेहत, साफ
पानी इत्यादि), तो भारत शायद सबसे नीचे है |

29) लोकतंत्र का मतलब है "लोगों का, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा" |
यदि हम इसे सफल बनाना चाहते हैं तो देश के नागरिकों को शाशन व्यवस्था का
हिस्सा बनना होगा |

30) दूसरे देशों के विपरीत भारत में 18 सरकारी भाषाएँ हैं, 4,000 बोलियाँ
और दुनिया के सारे धरम हैं | आर्थिक एवं सामाजिक विकास कम है और देश धरम,
जाती, भाषा, मजहब, क्षेत्र आदि मैं बँटा हुआ है |

31) सरकार की मौजूदा नीतिओं की वजह से देश में रोजगार के नए अवसर कम हैं
| ये नीतियाँ श्रम आधारित उद्योगों को बदावा नहीं देतीं | एशिया के दूसरे
देशों में प्रचलित काम के तरीकों को ध्यान में रख कर हमें अपने श्रम
कानूनों में जरुरी बदलाव करने चाहिए | ताकि हमारे उद्योग उन्हें सही
टक्कर दे सकें |

32) किसी उद्योग या संस्था का आकार सरकारी अधिकारिओं द्वारा तय नहीं किया
जाना चाहिए | यह तकनीक, निर्माण विधि, अंतराष्ट्रीय बाज़ार से और विरोधी
दबाव द्वारा तय होता है | लघु उद्योगों (SSI) के लिए मौजूदा नीतियों को
समाप्त किया जन चाहिए और छोटे तथा मध्यम उद्योग एवं व्यपार (SME's) को
बदावा दिया जाना चाहिए | लघु उद्योग भारत की कुल अर्थव्यवस्था का 7% हैं
| दुनिया के 99.7% उद्योग और व्यपार SME's हैं | छोटे तथा मध्यम उद्योग
एवं व्यपार (SME's) भारत की कुल अर्थव्यवस्था का 90% हैं | इसलिए हमें
इसके महत्व को समझना होगा |

33) लोकसत्ता के अनुसार केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा अनुमानित 2200
करोड़ रु. प्रतिदिन विभिन्न मदों पर खर्च किए जाते हैं | शाशन व्यवस्था
को बेहतर बनाने के लिए हमें साक्षरता को 100% तक करना होगा | नागरिक
संस्थाओं को शाशन व्यवस्था में भागेदारी और सूचना अधिकार के अधिकतम
प्रयोग से ही यह सम्भव हो पाएगा | इन हालातों में हम एक बेहतर शाशन की
कल्पना कैसे कर सकते हैं | हमे सबसे पहले उपने घर को समुचित योजना के साथ
सही करना होगा |


नवीन वर्षात पैशाचे उड्डाणपूल बांधूया!


 

या, श्रीमंत होण्याची सुरुवात करूया! चला या नवीन वर्षाचा एक संकल्प करूया... नवीन वर्षात मी पैसा कमावणार. माझी गुंतवणूक मीच करणार आणि माझा नफा मीच कमावणार. माझी कर्जे मीच फेडणार. माझ्या आयुष्यातल्या प्रत्येक आर्थिक अडचणींवर उड्डाणपूल बांधण्याचा कार्यक्रम मी या नवीन वर्षात सुरू करणार!

शेअर बाजार -सट्टा-असं काही म्हटलं की नुकसान -कर्ज -दिवाळखोरी-असंच चित्र डोळ्यांसमोर उभे राहण्याचे दिवस आता राहिले नाहीत, पण अजूनही मराठी माणसाला शेअर बाजाराची आणि त्यातल्या गुंतवणुकीबद्दल जी अढी आहे ती नाहिशी झालेली नाही.

योग्य वेळी कमीत कमी गुंतवणूक करणारा भवसागर तरून जातो आणि न करणारा नवसागरात बुडून जातो हे समजूनही अंगवळणी न पडणे ही आपली शोकांतिका आहे. मुळात मनात पैशाची सांगड पाप पुण्याशी घातलेली आहे ती वर्षानुवर्षाच्या गरिबीने. त्यामुळे गुंतवणुकीला सट्टा समजणारी आपण माणसे. जास्त पैसे कमावणे -गरजेपेक्षा चार पैसे जास्त खिशात असणे याची पण आपल्याला भीती. 

मराठी माणसाची (शेअर बाजारातील ) प्रतिमा उत्तम नोकरी करणारा माणूस अशी आहे. सचोटीने काम करणे हे त्याचे भांडवल आहे. त्यामुळे कर्ज देणार्‍याला हवी तशी प्रतिमा (प्रोफाईल)मराठी माणसाची आहे. त्यामुळे गरजेला कर्ज घेणारा मराठी माणूस गूंतवणूक करून पैसे कमावण्याच्या मार्गाला न जाता कर्ज काढून गरज भागवण्याच्या मागे असतो. साहजिकच आहे की मराठी माणसाच्या हातात शेअर बाजारातला एकही शेअर नसेल पण को ऑपरेटिव्ह क्रेडिट सोसायटीचे शेअर पहिल्या पगाराच्या दिवशी असतील.

कदाचित ही विधाने अतिरंजित वाटत असतील तर फोर्टमधल्या एखाद्या पेपर स्टॉलवर नजर ठेवा. बर्‍याच वेळा नव्या नोकरीचे फॉर्म आणि शेअर्सच्या नव्या इश्यूचे फॉर्म एकाच पेपरवाल्याकडे असतात. तासाभरात पन्नास नोकरीचे फॉर्म विकले जातात पण आमचा मराठी माणूस फुकट मिळणारा गुंतवणुकीचा फॉर्म उचलताना दिसणार नाही.

पण नोकरीतला माणूस दरवर्षी गरीब होत जातो हे सत्य आपल्या लक्षात येत नाही.

आपर्‍याला पगार मिळतात वर्षभरात फक्त बारा. 

त्यापैकी एक फंडात जमा होतो. 

एक आयकरात जातो. 

एक वैयक्तिक कर्ज फेडण्यात जातो.

एक पगार लग्न-बारशी किंवा इतर सामाजिक जबाबदार्‍यांसाठी.

अचानक उद्भवणार्‍या समस्यांसाठी एक पगार जातो. 

एक पगार विम्याचे हप्ते भरण्यात.

हातात उरले पगार सहा. त्यात खर्च चालवायचा बारा महिन्यांचा. 

पुढच्या दोन वर्षांत महागाई वाढली की हे प्रमाण पाच पगार आणि बारा महिने असे होईल.

म्हणजे एकूण अंदाजपत्रक असलंच तर ते तुटीचे आहे.

मग आपला संसार चालतो कसा? 

तो चालतो कर्ज काढून किंवा हातात अचानक लाभानी येणारे पैसे वापरून. दरवर्षी नवीन कर्ज काढून किंवा असलेल्या कर्जाची मुदत वाढवून.

थोडक्यात काय तर आगामी भविष्यकाळातील मिळणारा वाढीव पगार वर्तमान काळातच संपून जातो. 

मग या दुष्टचक्रातून सुटका होणार कशी? 

दरवर्षी पैसे कमी पडत असल्याची भावना वारंवार जागृत झाल्यावर खटपट सुरू होते जास्त पैसे मिळवण्याच्या सोप्या तोडग्याची आणि मग आपली गाठ पडते पैसे खाणार्‍या लांडग्यांशी. हे लांडगे वेगवेगळ्या नावानी आपल्या समाजात फिरत असतात. कधी त्यांचे नाव कल्पवृक्ष असते तर कधी शेरेकर तर कधी उदय आचार्य तर कधी लिमोझिन. गेल्या दहा वर्षांत अशा लांडग्यांनी आपल्याला जवळजवळ दहा हजार कोटींना नागवले आहे.

या लांडग्यांच्या तोंडी घास घालण्यापेक्षा तेच पैसे फक्त आय.पी.ओ. म्हणजे नव्या कंपन्यांच्या निर्धोक गुंतवणुकीत टाकले असते तर काय झाले असते ते पहा. फक्त गेल्या वर्षाचा म्हणजे २०१०चा विचार करा. समजा गुंतवणुकीची सुरुवात जानेवारी महिन्यापासून केली असती तर डिसेंबरपर्यंत प्रत्येक गुंतवणुकीवर चाळीस टक्क्यांचा नफा झाला असता. म्हणजे एक वर्षात एका लाखाचे कमीतकमी दोन लाख झाले असते. (आणि आपले पैसे आपल्याच ताब्यात राहिले असते. थोडक्यात एकच रस्ता आहे या गरिबीच्या दुष्टचक्रातून बाहेर येण्याचा तो म्हणजे सुयोग्य गुंतवणुकीचा.

एक प्रश्‍न मनात नक्की येईल तो म्हणजे मी गुंतवणूक का करायची? कारण तुमची बचत खात्यातली रक्कम अडीच ते तीन टक्के व्याज देते -मुदतबंद खात्यावर परतावा फक्त आठ टक्के मिळतो आणि महागाई दहा टक्क्यांनी वाढते. म्हणजे दरवर्षी बचतीची किंमत वाढण्याऐवजी कमी होत जाते आहे. महागाईवर मात करायची असेल तर महागाईपेक्षा जास्त दरानी वाढ होईल अशाच क्षेत्रात जायला हवे. या साठी अनेक रस्ते आहेत .

क्रमांक एक : शेअर बाजारात गुंतवणूक .

क्रमांक दोन : कमोडिटी बाजारात गुंतवणूक करण.

क्रमांक तीन : फॉरेन एक्सेंजची खरेदी विक्री म्हणजेच फॉरेक्स मार्केट

तीन पर्यायातून कुठलाही निवडा. हे दर महिन्यात -दर आठवड्यात दर दिवशी उत्पन्न मिळवून देणारे तीन सोपान आहेत. सोपे आहेत म्हणून ते सोपान आहेत . सुरुवात मात्र शेअर बाजारातून करायला हवी.



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