Saturday, March 3, 2012

ई-कचरे के खतरे



 ई-कचरे के खतरे
(भारत में बढ़ते ई-कचरे की समस्या पर डॉ. महेश परिमल के विचार)
घरों से लेकर कार्यालयों तक में ई- कचरे की भरमार है। जब से अधिकांश काम बिजली पर निर्भर हो गए हैं तब से नए-नए गैजेट्स बाजार में आ रहे हैं। नई चीजें आने के कारण पुरानी चीजें कबाड़ में जा रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स की न जाने कितनी चीजें कुछ दिनों बाद ही आउटडेटेड हो जाती हैं। ये सभी चीजें आखिरकार कबाड़ बन जाती हैं। इन सबसे देश में इलेक्ट्रॉनिक्स कचरों की भरमार हो रही है। पहले यह समस्या नहीं के बराबर थी पर जब से लोग इलेक्ट्रॉनिक्स चीजों पर निर्भर होने लगे हैं तब से ई-कचरे की समस्या विकराल रूप धारण कर रही है। पश्चिमी देशों में जहां इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का अधिक इस्तेमाल होता है, वहां उनके रिसाइकिलिंग की भी व्यवस्था है। इसके लिए विशेष रूप से योजना बनाई जाती है और उपकरण भी तैयार किए जाते हैं। जैसे कागज का कचरा, भोजन का कचरा और इलेक्ट्रॉनिक कचरा। इसमें मेडिकल कचरे के निकास के लिए विशेष प्रकार की व्यवस्था की गई है। ई-कचरा से खराब होने वाली जमीन को ठीक नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे जमीनें बंजर हो जाती हैं। 2005 में ई-कचरा 4 लाख मीटि़्रक टन था जो अब बढ़कर 8 लाख मीट्रिक टन पहंुच गया है। भारत में अधिकृत ई-कचरा रिसाइकिलर्स की संख्या 47 है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में समुद्री मार्ग से ई-कचरा आ रहा हैं जिसे भारत में खपाया जा रहा है। ये चीजें वैसे तो सेकंडहैंड चीजों के रूप में बेचने के लिए इस्तेमाल में लाई जाती हैं, लेकिन ये अंतत: कबाड़ में ही जाती हैं। दिल्ली में पुरानी चीजों या कम उपयोग में लाई गई चीजों का अलग बाजार है, जहां आधी कीमत पर कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान आसानी से मिलते हैं। जब से भारत में इलेक्ट्रॉनिक प्रतिस्पर्धा बढ़ा है और बिना ब्याज के किस्तों में चीजें मिलने लगी हैं तब से सेकंडहैंड चीजें कोई इस्तेमाल नहीं करना चाहता। दूसरी तरफ नई तकनीक की चीजें और नए गैजेट्स के आने से सेकंडहेंड चीजों का बाजार की खत्म होने लगा है। अतएव विदेशी जहाजों से आने वाली चीजें कुछ समय बाद ही कबाड़ का रूप ले लेती हें। वैसे भी हमारे देश में यह कहावत प्रचलित है कि सस्ती चीजें कबाड़ के भाव में बेची जाती हैं। गांवों में आज भी कचरे को गड्ढे में डालने का रिवाज है। इससे खाद बनता है, जो खेतों में काम आती है पर इस कचरे में प्लास्टिक नहीं होता। जब से गांवों में इलेक्ट्रॉनिक की चीजें आने लगी हैं तब से कचरे में यह भी शामिल हो गई हैं जिससे गांवों में ई-कचरे का खतरा बढ़ रहा है। यदि कचरे में प्लास्टिक, बिजली के तार आदि शामिल कर दिए जाएं तो वह खाद के रूप में नहीं बदलता। इस तरह की चीजों से बनने वाली खाद फसल के लिए भी हानिकारक साबित होती है। इलेक्ट्रॉनिक कचरे की रिसाइकिलिंग के लिए हमारी सरकार अभी तक सचेत नहीं हुई है। जिस तरह से नगरपालिका निगम मेडिकल कचरे के लिए सचेत है, उसी तरह ई- कचरे के लिए भी सचेत होने की आवश्यकता है। वैसे यदि रिसाइकिलिंग की दिशा में गंभीरता से किया जाए तो यह फायदे का सौदा साबित हो सकता है। कंप्यूटर के प्रिंटेड सर्किट बोर्ड में सोना होता है जिसे निकालकर लाभ कमाया जा सकता है। दो लाख पीसीबी से करीब 180 ग्राम सोना निकाला जा सकता है। यूनियन कार्बाइड का उदाहरण हमारे सामने है। उसका नाम अब भले ही बदल गया हो पर उसका मलबा अभी भी जमीन के अंदर जा रहा है और जलस्रोतों को प्रदूषित कर रहा है। पर्यावरणविदों ने सरकार का ध्यान कई बार इस दिशा में आकृष्ट किया है। आज भी भोपाल में यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री में रासायनिक कचरों का ढेर लगा है। पिछले 27 सालों में यह कचरा जमीन के भीतर तक पहुंच गया है। यह धरती को तो बंजर करने के अलावा जलस्रोतों को भी प्रदूषित कर रहा है। भविष्य में ऐसे हालात ई-कचरे से भी पैदा होने तय हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

संस्कृति और विकास :




मित्रो दुनिया में कुल मिलाकर 249 देश है और हर देश की पहचान उसके संस्कृति से है , जैसा देश वैसा भेस , हर देश के लोग अलग है , हर देश का खान पान अलग है ,हर देश का रहन सहन अलग है , कुल 249 देशो में से कुछ ही देश ऐसे है जिनपे विदेशी ताकतों ने और बाहरी आक्रमंकरियो ने शासन न किया हो , जिन देशो की संस्कृति की जड़े कमजोर थी वो तो विदेशी ताकतों के शासनकाल में ही मिट गयी और जो संस्कृति ...बची उसने देश के आज़ाद होने के पश्चात उस देश की विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है ।

भारत की पहचान हिंदुवो से है , ऋषि मुनियों और सनातन धर्म से है , अगर ये मिट गयी तो भारत कभी भारत नहीं रहेगा, और अगर भारत की जड़े सनातन धर्म में बसती तो किसी के ये कहने से की भारत एक हिन्दुरास्त्र है किसी को क्या तकलीफ होती है , सनातन ने सर्व धर्म समभाव को अपनाया और बिना किसी भेद भाव के सबको यहाँ रहने की अनुमति दी और आज देश की मूल संस्कृति पर ही संकट आन पड़ा है , देश के आज़ादी के बाद भी इन पुरातन मूल्यों का हनन हुआ है तो देश तरक्की कहा से करेगा ।

अगर हम दुनिया के विकसित देश जैसे नोर्वे , नेदरलैंड , यूनाइटेड स्टेट की बात करे तो ते देश ये देश क्रमशः
१. नोर्वे - 17 may 1814 को swedish रूल से आज़ाद हुआ (

२. नेदरलैंड - 5 may को nazi germany के शासन से आज़ाद हुआ (
३. यूनाइटेड स्टेट - 4 july 1776 को kingdom of britain से आज़ाद हुआ ()


आज़ाद होने के बाद इन देशो ने सबसे पहले जिन मुलभुत चीजो की और ध्यान दिया वो है :

१ . अपनी भाषा शैली
२. अपनी शिक्षा व्यवस्था
३. अपनी शसक्त कानून
(ये तीनो चीजे शसक्त हो ये देश के पुरातन संस्कृति पर ही आश्रित है )


मित्रो ये तीनो मुलभुत चीजो को जिन देशो ने भी अपनाया है वो आज विकसित देश के नाम से जाने जाते है , अगर बात हम अपने देश भारत की करे तो 15 अगस्त 1947 को हम ब्रिटिश शासन से आज़ाद हुए , लेकिन आज भी हम जिस देश के गुलाम थे उनकी ही भाषा अंग्रेजी को अपनाये हुए है , मेकोले की बनायीं हुई शिक्षा व्यवस्था आज भी चल रही है हमारे देश में ,
अंग्रेजो के द्वारा ही बनायीं हुई संविधान के कानून का पालन करने पर मजबूर है हम , जो कानून अंग्रजो ने अपनी सहूलियत के लिए बनायीं थी इस देश में राज़ करने के लिए वो कानून आज भी चल रही है तो कोई न्याय की बात कैसे सोच सकता है , कुल मिलाकर देखा जाये तो हम आज भी गुलाम है , कोई आज़ादी नहीं आई है इस देश में ।

आज भी लोग यही सोच रहे है की केवल सत्ता परिवर्तन से देश चहुमुखी विकास करने लगेगा , कितने ग़लतफहमी में जी रहे है लोग , हां ये कह सकते है की इतने वर्ष शासन करने के बाद भी वर्तमान सरकार ने देश को ये दिया है जिससे आज भी आज़ादी के इतने सालो बाद भी भूख से मरना पड़ रहा था तो इस सरकार को जड़ से उखाड़ फेकना बहुत जरूरी है , ।


जय हिंद


शहरीकरण का कड़वा सच



शहरीकरण का कड़वा सच
 
(संदभ : बच्चों पर यूनिसेफ की रिपोट)
 
जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में शहर तेजी से ब़ढ रहे हैं यूनिसेफ के एक ताजा आकलन के मुताबिक अगले 15 सालों में भारत की करीब 40 फीसदी आबादी शहरों में होगी इसी तसवीर का दूसरा पहलू यह है कि गांव धीरे-धीरे खत्म होंगे और शहरों का विस्तार तेज होगा शहरीकरण के साथ यह उम्मीद भी पनपती है कि शहर ह्लयादा से ह्लयादा लोगों को रोजगार, सामाजिक विकास और आथिक प्रगति में भागीदार बनाता है लेकिन कड़वा सच यह है कि शहरों के विस्तार के साथ-साथ यहां बुनियादी सुविधाओं से महरूम मलिन बस्तियां भी तेजी से फैल रही हंै आज के भारत में करीब 50 हजार मलिन बस्तियां हैं, जिनमें 9 करोड़ से ह्लयादा लोग रहते हैं ऐसी बस्तियों में रहने वाला तीन में से एक व्यक्ति या तो नाले या रेल लाइनों के किनारे रहता है ये वे लोग हैं जो रोजी-रोटी और बेहतर कल की तलाश में अपना गांव छोड़ कर शहरों की ओर निकले थे इस उम्मीद में कि शहर उन्हें न सिफ रहने के लिए छत और रोजी-रोटी देगा, बल्कि एक आथिक सुरषा भी मुहैया करायेगा उन्हें और उनके बच्चों को एक समान अवसर और सम्मान का जीवन देगा लेकिन हकीकत इससे उलट है यूनिसेफ की 'चिल्ड­ेन इन एन अबन वल्ड' नामक रिपोट कहती है कि शहर में रहने वाले गरीब और उनके बच्चों की हालत गांव के गरीबों से ह्लयादा बदतर है रिपोट के मुताबिक भारतीय शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या 37 करोड़ से ह्लयादा है और शहरों में आने वाले 60 फीसदी प्रवासी गांवों से आते हैं दरअसल, शहर गांव से आने वालों को दैनिक आमदनी का जरिया जरूर देता है, लेकिन साथ ही उपभोग का तरीका भी बदल जाता है गांव के मुकाबले वे ह्लयादा कीमत चुका कर अपने जीवन यापन के लिए जरूरी चीजें हासिल कर पाते हैं फिर यही शहर उनकी पहचान पर भी सवाल खड़े करता है उनसे उनका सहज सामाजिक परिवेश छीन लेता है वोटर आइ काड और राशन काड जैसे पहचान के जरूरी दस्तावेज के अभाव में उन्हें उन सामाजिक कल्याणकारी सुविधाओं से भी दूर होना पड़ता है, जो उन्हें गांव में ह्लयादा आसानी से उपलब्ध थी इनकी सबसे ह्लयादा मार झेलते हैं इन परिवारों के बच्चे इन मलिन बस्तियों में रह रहे बच्चों की प्रतिभा बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ देती है वे एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं, जो गांवों से भी बदतर होती है ऐसे में यूनिसेफ का यह आग्रह तत्काल गौर करने लायक है कि सरकार शहरों को लक्ष्य बनाकर नयी योजनाएं बनाए, जैसा कि वह गांवों के मामले में करती है      

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दंत विहीन हो जाएगा चुनाव आयोग



दंत विहीन हो जाएगा चुनाव आयोग
--मिथिलेश झा
 
पिछले दिनों चुनाव आयोग की नाराजगी का दंश झेलने वाले केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने संकेत दे दिया कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया खत्म होने के बाद चुनाव सुधारों पर विचार किया जाएगा, जिसमें आचार संहिता के उल्लंघन का मामला भी शामिल हो सकता है। सरकार के इस प्रयास से एक ओर तो चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती होगी, दूसरी ओर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों और पार्टियों को नियंत्रण में रखने के लिए आचार संहिता का जो एक मजबूत हथियार चुनाव आयोग के पास है, केंद्र सरकार इसे छीन लेने की तैयारी में है। अगर आचार संहिता को वैधानिक दर्जा दे दिया गया तो आयोग दंतविहीन हो जाएगा। इसे वैधानिक दर्जा मिलने की सूरत में स्थानीय प्रशासन मुकदमा दर्ज करेगा और उसकी सुनवाई अदालत में होगी। फैसला आने में दस वर्ष भी लग सकते हैं और तब तक दोषी सत्ता का मजा लूटता रहेगा। दरअसल, पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस बार चुनाव आयोग ने दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए। पहला, उसने केंद्र सरकार के उस फैसले पर चुनाव तक के लिए रोक लगा दी, जिसमें पिछड़े वर्गो के लिए निर्धारित 27 फीसदी आरक्षण में से 4.5 फीसदी अल्पसंख्यकों को दिए जाने की बात है। दूसरा, आयोग ने उत्तर प्रदेश में मायावती और हाथियों की मूर्तियों को ढकने का निर्देश दिया। दूसरे मामले में जब आयोग ने कदम उठाया तो कांग्रेस नेताओं को कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन जब इनके अपने नेताओं पर आयोग ने कार्रवाई की तो कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच आने लगी। कांग्रेस के कई नेता आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ लगातार बयान दे रहे हैं। निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव कराना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है और यह संविधान का बुनियादी हिस्सा है। संविधान के अनुच्छेद 324 में आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन में कार्रवाई का अधिकार केवल चुनाव आयोग को है। यह सही है कि चुनाव आचार संहिता कानूनी प्रावधान की शक्ल में नहीं है और इस कारण उम्मीदवार और राजनीतिक दलों को इसके उल्लंघन पर गंभीर कार्रवाई का डर नहीं सताता। मगर इसी संहिता के बल पर गत दो दशक में निर्वाचन आयोग ने चुनावों को साफ-सुथरा और अनुशासित बनाने के सराहनीय प्रयास किए हैं। वर्तमान में चुनाव आयोग के पास आचार संहिता लागू करने के लिए व्यापक शक्तियां हैं। 1978 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने (मोहिंदर सिंह गिल मामला) यह व्यवस्था दी कि जहां संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानून हैं, वहां तो आयोग उन कानूनों के अनुरूप काम करेगा, लेकिन जिन मामलों पर कोई कानून नहीं है, वहां आयोग को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का व्यापक अधिकार है। पिछले कुछ समय से जिस प्रकार राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और उम्मीदवार अपनी अनुशासहीनता की हद पार करते देखे गए हैं, उस परिप्रेक्ष्य में आयोग के पास कार्रवाई के कुछ और अधिकार होने चाहिए। चुनाव आचार संहिता को संवैधानिक रूप देने का प्रस्ताव न सिर्फ निरंकुश मानसिकता का परिचायक है, बल्कि यह व्यावहारिक भी नहीं है। भारतीय अदालतों में पहले से ही काम का बोझ है। करोड़ों मामले अदालतों में अब भी लंबित पड़े हैं। ऐसी स्थिति में अदालत से यह उम्मीद करना कि वह समय पर चुनाव आचार संहिता संबंधी एक अतिरिक्त मामले की सुनवाई कर पाएगी, व्यर्थ है। फिर निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान नियम-कायदों की अनदेखी पर अंकुश किस प्रकार लग पाएगा। संवैधानिक संस्थाओं पर कुठाराघात कांग्रेस सरकार करती आई है। दागी होने लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्तियों के बावजूद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने पीजे थॉमस को सीवीसी जैसे संवैधानिक पद पर नियुक्त कर दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया था। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले को लेकर सीएजी ने जो आकलन किया, उस पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने शून्य क्षति की बात ही नहीं कही, बल्कि सीएजी के अधिकार-क्षेत्र पर भी सवालिया निशान लगाकर सीएजी की प्रतिष्ठा पर चोट पहुंचाई। सीबीआइ का दुरुपयोग छिपा हुआ नहीं है। अब निर्वाचन आयोग के अधिकारों को भी कुचलने की साजिश चल रही है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

राजनीति की बलि चढ़ते वैज्ञानिक



राजनीति की बलि चढ़ते वैज्ञानिक
--निरंकार सिंह
 
अंतरिक्ष विज्ञानी आर. नरसिंह का इस्तीफा यही जाहिर करता है कि वैज्ञानिक संस्थानों में भी राजनीतिक उठापटक का खेल शुरू हो चुका है। कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कृषि वैज्ञानिकों के एक सम्मेलन में उनकी प्रशासनिक क्षमताओं का उपयोग नहीं हो पाने का मुद्दा उठाया था। अब आर. नरसिंह जैसे सम्मानित वैज्ञानिक का अंतरिक्ष कार्यक्रम की नियामक संस्था से इस्तीफा देना यही साबित करता है कि जिन संस्थाओं पर देश गर्व करता था, वहां भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। एंट्रिक्स-देवास करार को लेकर इसरो के पूर्व प्रमुख जी. माधवन नायर सहित चार वैज्ञानिकों के खिलाफ की गई कार्रवाई से नरसिंह नाराज थे। इसमें संदेह नहीं कि नरसिंह एक योग्य वैज्ञानिक हैं और वह इसरो से 25 साल तक जुड़े रहकर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में उनकी अहम भूमिका रही है। वह अंतरिक्ष आयोग में 20 साल सदस्य रहे और महत्वपूर्ण योगदान लिए उन्हें पद्मभूषण सहित कई पुरस्कार दिए गए। जब एंट्रिक्स-देवास समझौते की जांच के बाद सरकार ने माधवन नायर और तीन अन्य वैज्ञानिकों को कोई भी सरकारी पद या जिम्मेदारी देने पर रोक लगा दी तो आर. नरसिंह को भारी सदमा पहुंचा, क्योंकि माधवन नायर को चंद्रयान एक की सफलता का श्रेय दिया जाता है और महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें पद्मविभूषण से भी नवाजा गया, लेकिन नरसिंह का विरोध ज्यादा मायने रखता है। वह इसरो की कारोबारी शाखा एंट्रिक्स और निजी कंपनी मल्टीमीडिया देवास के बीच एस बैंड स्पेक्ट्रम को लेकर हुए व्यावसायिक करार की जांच करने वाली समिति में शामिल थे। सरकार अपनी बचाव में जांच के निष्कर्ष को ही हवाला देती आई है, लेकिन नरसिंह का कहना है कि उन्होंने अन्याय, जालसाजी या व्यक्तिगत लाभ का कोई सबूत नहीं पाया। नरसिंह ने स्वीकार किया कि इस सौदे में कुछ खामियां थीं और उन्होंने इस संबंध में सुझाव भी दिए थे। सरकार की कार्रवाई वैज्ञानिकों का मनोबल तोड़ने वाली है, क्योंकि किसी भी तकनीकी पहल के नाकाम होने का जोखिम तो सदैव बना रहता है। एंट्रिक्स देवास करार का विवाद उठने पर जिस समिति ने जांच की थी उसने सारा ठीकरा नायर और तीन अन्य वैज्ञानिकों पर फोड़ दिया और उनकी बात नहीं सुनी, जबकि इस करार को मंजूरी अंतरिक्ष आयोग ने दी थी। प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव, कैबिनेट सचिव और वित्त सचिव भी आयोग के सदस्यों में शामिल हैं। यदि कोई गड़बड़ी थी तो उस समय इन सदस्यों को क्यों नहीं पता चला और उस पर क्यों नहीं रोक लगाई गई। यदि इस करार के लिए नायर और उनके तीन वैज्ञानिक साथी दोषी हैं तो बाकी लोग कैसे दोषमुक्त हो सकते हैं। यह एक अहम सवाल है जिसका जवाब फिलहाल सरकार के पास नहीं है। जब किसी मामले या सौदे में कोई घपला या घोटाला पाया जाता है तो कुछ छोटे-मोटे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करके मामला खत्म कर दिया जाता है, लेकिन एंट्रिक्स देवास करार के मामले में जिन वैज्ञानिकों को बलि का बकरा बनाया गया वे देश के होनहार वैज्ञानिक हैं। इसलिए इस मामले के तकनीकी और गैर तकनीकी सभी पहलुओं की उच्चस्तरीय जांच के बाद ही कोई कार्रवाई होनी चाहिए थी। सरकार ने अपनी साख बचाने के लिए जल्दबाजी में जो कार्रवाई की है उससे देश के वैज्ञानिकों में भारी रोष है। अंतरिक्ष वैज्ञानिक आर. नरसिंह का इस्तीफा इसी रोष की अभिव्यक्ति है। उधर इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने तत्कालीन इसरो के अध्यक्ष राधाकृष्णन पर सरकार को गुमराह करने का आरोप लगाया है। उन्होंने एंट्रिक्स देवास करार की फिर से जांच कराने की मांग की है। नायर ने प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायण सामी को पत्र भेजकर इस सौदे के पहलुओं को स्पष्ट किया है। नायर के अनुसार अधिकारिक रिपोर्ट से परे भी कई चीजें हैं। एंट्रिक्स देवास करार देश में नई प्रौद्योगिकियों को लाने के लिए था। पता नहीं किन कारणों से वे इसे निरस्त करने और यह सब नाटक करने के लिए मजबूर हुए। बीके चतुर्वेदी और आर. नरसिंह की दो सदस्यीय समिति ने एंट्रिक्स-देवास समझौते के तकनीकी, व्यावसायिक, प्रक्रियात्मक और वित्तीय पहलुओं की समीक्षा की थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि देवास स्पेक्ट्रम की बिक्री की चिंताओं का कुछ भी आधार नहीं है, लेकिन प्रत्यूष सिन्हा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का कहना था कि न केवल प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक खामियां हुई हैं, बल्कि कुछ लोगों की ओर से कपटपूर्ण कार्रवाई की बात भी सामने आई है। सिन्हा समिति की मानें तो नायर समेत इसरो के चार पूर्व वैज्ञानिक इसके लिए जिम्मेदार है। इन रपटों के आधार पर ही नायर और तीन अन्य वैज्ञानिकों को किसी भी सरकारी पद पर काबिज होने से रोक लगाई गई। अब आर नरसिंह के इस्तीफे से इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है। ऐसा लगता है कि जांच समिति के निष्कर्षो को ठीक से समझा नहीं गया और जल्दबाजी में की गई इस कार्रवाई से पूरे वैज्ञानिक समुदाय में कुंठा व्याप्त है। उधर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत काम करने वाले देश के प्रमुख शोध संस्थान सीएसआइआर के कामकाज में अनियमितताएं बढ़ी हैं। इसके लिए वर्तमान महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी की नियुक्ति पर विभाग के मंत्री रहे कपिल सिब्बल पर भी सवाल उठ रहे हैं। देश के कई वैज्ञानिक संस्थानों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं पर ऐसे मठाधीशों का कब्जा है जिनका अकादमिक कार्य इस स्तर का नहीं है कि वे किसी संस्थान के निदेशक बनाए जाएं, लेकिन अपनी पहुंच के बल पर वे वैज्ञानिक अनुसंधान के मुखिया बने हुए हैं। विज्ञान में कुछ करने का मतलब है कि कोई नया आविष्कार किया जाना, लेकिन जब चुके हुए लोग राजनीतिक तिकड़म और भाई-भतीजावाद से वैज्ञानिक संस्थानों को चलाएंगे तो परिणाम समझा जा सकता है। सरकारी समिति ने देश की 40 अनुसंधान शालाओं के काम की जांच करके रिपोर्ट दी थी कि वैज्ञानिक कर्मचारियों की भर्ती निष्पक्ष नहीं है। इसमें भाई-भतीजावाद और लालफीताशाही का बोलबाला है। इसने सरकार से सिफारिश की कि थी नौ अनुसंधानशालाओं के निदेशकों को चेतावनी दी जाए और दो निदेशकों को सजा दी जाए। पता नहीं उस आयोग की सिफारिश पर अमल हुआ या नहीं। शायद इन्हीं कारणों से वैज्ञानिक समुदाय में कंुठा बढ़ रही है, जो त्यागपत्र और आत्महत्या के रूप में सामने आ रही है। यह अकारण नहीं है कि जिन भारतीय वैज्ञानिकों ने नाम कमाया है वे विदेशों में बस चुके हैं। लगभग पांच लाख भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर आज देश से बाहर काम कर रहे हैं। आज भी विश्वस्तरीय माने जाने वाले हमारे आइआइटी के एक तिहाई छात्र विदेशों का रुख कर रहे हैं। इससे देश को लगभग 13 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

सभ्य होने पर बड़ा सवाल



सभ्य होने पर बड़ा सवाल
 
- (दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं के पीछे पुरुषों के वर्चस्ववादी दृष्टिकोण को मुख्य कारण मान रहे हैं डॉ. निरंजन कुमार)
पिछले कुछ दिनों से दुष्कर्म से संबंधित घटनाएं समाचारों की सुर्खियों में हैं। खास तौर से बंगाल में हुई ऐसी घटनाओं को सारे देश के मीडिया में जगह मिली। हालांकि बंगाल में इन घटनाओं को एक राजनीतिक रंग दे दिया गया है। इसी तरह की एक अन्य घटना राष्ट्रीय खबर बनी जब नोएडा में एक किशोरी के साथ हुए दुष्कर्म में उच्च पुलिस अधिकारी ने बड़े भद्दे तरीके से बर्ताव किया। इन सबके अतिरिक्त बिहार, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि लगभग सभी हिस्सों से दुष्कर्म या उत्पीड़न की घटनाएं सुनने को मिलती आ रही हैं। हो सकता है कि इनमें से एकाध घटनाएं सत्य न होकर विरोधी पक्ष को फंसाने या बदनाम करने की साजिश हो, लेकिन इस बात से कतई नहीं इंकार किया जा सकता है कि ऐसे जघन्य कांड आए दिन हो रहे हैं। क्यों हो रही हैं ऐसी घटनाएं? इन्हें कैसे रोका जाए और इनसे कैसे मुक्ति मिले? इन सबके लिए इन घटनाओं के पीछे के समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को समझना जरूरी है। आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अथवा कर्नाटक के महिला और बाल कल्याण विकास मंत्री के हालिया बयान कि दुष्कर्म या उत्पीड़न जैसी घटनाओं के पीछे स्ति्रयों की पोशाक ही है, एक गंभीर घटना का सतही आकलन तो है ही, साथ ही गैरजिम्मेदाराना भी है। दरअसल इस तरह की घटनाओं के बहुआयामी कारण हैं। समाजशास्ति्रयों के अनुसार इसके लिए जो चीज सबसे अधिक जिम्मेदार है वह है हमारी पुरुष वर्चस्ववादी और अहंवादी दृष्टि, जिसके तहत स्ति्रयों को निम्न, साथ ही उपभोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है और कई बार रंजिश में बदला लेने के लिए औरतों की इज्जत को निशाना बनाया जाता है। यह स्थिति केवल एक धर्म, जाति या समुदाय तक सीमित नहीं है। इसी मानसिकता की ही एक अभिव्यक्ति है जिसमें बेटे को ही सामाजिक-आर्थिक उत्तराधिकारी समझा जाता है और बेटी को पराया धन और इस कारण बेटा पैदा करने को वरीयता दी जाती है। यह अकारण नहीं है कि देश में लिंग अनुपात अर्थात प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले स्ति्रयों की संख्या में कमी आती जा रही है और इसमें भी बाल- लिंग अनुपात (5 वर्ष से छोटे बच्चों में प्रति 1000 लड़कों में लड़कियों की संख्या) दर तो और भी कम होती जा रही है। यह एक खतरनाक स्थिति है जो आगे चलकर कई तरह के असंतुलनों को जन्म देगी, लेकिन अफसोस है कि हमारे नीति निर्धारकों को वास्तविक राष्ट्रीय हितों-मुद्दों से कोई मतलब ही नहीं है। दुष्कर्म की इन घटनाओं को देखें तो इनसे एक बात स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है कि इसमें शिकार सिर्फ वे युवा स्ति्रयां नहीं हैं जो नैतिकता के तथाकथित ठेकेदारों की नजर में उत्तेजक वस्त्र पहनती थीं, बल्कि इनमें काफी बड़ी संख्या नाबालिग लड़कियों की रही हैं। इस प्रकरण का सबसे दुखद पक्ष यह है कि नाबालिगों में 5-10 साल की अबोध लड़कियां भी रही हैं। इसी तरह 30 वर्ष से अधिक के उम्र के महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है। ये तथ्य पोशाक वाली थ्योरी का एक तरह से खंडन करते हैं। पोशाक वाली थ्योरी इस बात से भी गलत सिद्ध हो जाती है कि इन घटनाओं में कई बार दुष्कर्म निकट का रिश्तेदार रहा है या परिचित अथवा मित्र जैसा व्यक्ति। फिर कई घटनाओं में तो दुष्कर्मी डॉक्टर या मेडिकल पेशे से जुड़ा हुआ व्यक्ति पाया गया, जिसके पास स्त्री चिकित्सकीय सलाह या मदद के लिए गई थी। इस तरह के कृत्यों के लिए एक अन्य स्थिति जो जिम्मेदार है वह है सामुदायिकता की भावना का उत्तरोत्तर कम होते जाना। किसी समय हमारे समाज, मोहल्ले, गांव, कस्बे एक विस्तृत परिवार की तरह होते थे। जहां अड़ोसी-पड़ोसी तक का लिहाज किया जाता था, लोग एक दूसरे के सुख-दु:ख में साझेदारी किया करते थे, लेकिन बढ़ते हुए नगरीकरण, एकाकीपन, चरम वैयक्तिकता और आगे बढ़ने की होड़ आदि ने इस सामूहिकता की भावना को कमजोर किया है। इसी के साथ-साथ एक चीज जो बच्चों, यहां तक कि युवा पीढ़ी में आती जा रही है कि शारीरिक खेलों की जगह, जो सामूहिकता की भावना को मजबूत करते हैं वे टीवी, वीडियो गेम आदि तक सीमित होते जा रहे हैं। रही-सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी है। कंप्यूटर और इंटरनेट के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। यहां इशारा इस बात की ओर है कि कैसे कंप्यूटर-इंटरनेट के दुष्प्रभावों से बचा जाए, खास तौर से पोर्नोग्राफी जैसी चीजों से, जो अपरिपक्व मन को विकृत ही करती है या वर्चुअल रियलिटी जैसी चीजों से जो इंसान को एक भ्रामक भुलावे के स्थिति में छोड़ देती है। यहीं रेप का मनोवैज्ञानिक पक्ष सामने आता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार आम तौर पर दुष्कर्मी या तो भावनात्मक रूप से अशांत- विक्षुब्ध होते हैं या फिर व्यक्तित्व के विकार से ग्रस्त। अभी हाल में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रपट में कहा गया है कि भारत आज दुनिया के उन देशों में है जहां हेरोइन की खपत सबसे ज्यादा हो रही है। वैसे देखा जाए तो दुष्कर्म की घटनाओं में समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक कारक मिले-जुले होते हैं और हर मामले की अपनी कुछ विशिष्टताएं होती हैं, जिन्हें अलग- अलग रेखांकित किया जाना चाहिए। पुलिस और न्याय व्यवस्था के अक्सर असंवेदनशील दिखने वाले रवैये को भी बदलने की जरूरत पर विचार करने की आवश्यकता है। न केवल हर थाने में महिला पुलिस की तैनाती हो, बल्कि इसके मुकदमे में दोनों ही पक्षों के वकील अनिवार्य रूप से महिलाएं ही हों। दुष्कर्म के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित होने चाहिए ताकि दोषियों को जल्द से जल्द दंडित किया जा सके। समय आ गया है कि सरकार विभिन्न पक्षों से मिलकर इस दिशा में कार्य करे। (लेखक दिल्ली विवि में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

पोलियो मुक्त देश का सपना



 पोलियो मुक्त देश का सपना
 
--(भारत का नाम पोलियो प्रभावित सूची से हटने पर जाहिद खान की टिप्पणी)
16 साल की जीतोड़ कोशिशों के बाद मुल्क के पोलियो मुक्त होने का स्वप्न पूरा होता दिख रहा है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने एक साल से ज्यादा समय से पोलियो मुक्त रहने की वजह से भारत का नाम पोलियो प्रभावित मुल्कों की सूची से हटा दिया है। सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले हमारे देश के लिए यह एक ऐसी उपलब्धि है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि यदि कोई काम ईमानदारी से किया जाए, तो मंजिल पर पहुंचना मुश्किल नहीं। सरकारी कार्यक्रम के प्रभावकारी क्रियान्वयन, स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं और सामाजिक संस्थाओं की एकजुट मुहिम ने वह कर दिखाया, जो एक समय मुश्किल लक्ष्य लगता था। अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं जब भारत में, पोलियो के मामलों का उच्चतम भार 741 था। यह आंकड़ा तीन अन्य पोलियो पीडि़त देशों से भी ज्यादा था। गौरतलब है कि पांच साल उम्र तक के बच्चों को अपना शिकार बनाने वाले पोलियो के वायरस से बच्चे लकवाग्रस्त हो जाते हैं। साल 1988 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रोटरी इंटरनेशनल, यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन और यूनीसेफ के सहयोग से पोलियो उन्मूलन के लिए जब विश्वव्यापी मुहिम छेड़ी, तब पोलियो महामारी से कोई 125 से ज्यादा मुल्क पीडि़त थे। खास तौर पर यह बीमारी अविकसित और पिछड़े देशों में ज्यादा थी। धीरे-धीरे विश्व स्वास्थ्य संगठन की कोशिशें रंग लाई। जहां-जहां डब्ल्यूएचओ ने पल्स पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया, वहां इस महामारी का प्रभाव कम होता चला गया। फिलहाल, पोलियो महामारी से पीडि़त मुल्कों की संख्या घटते-घटते अब सिर्फ तीन तक सीमित रह गई है। जिसमें हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान के अलावा अफ्रीकी मुल्क नाइजीरिया शामिल है। साल 1995 में भारत सरकार ने भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से पोलियो उन्मूलन के लिए पल्स पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम (पीपीआई) शुरू किया। कार्यक्रम का मकसद ओरल पोलियो टीके यानी ओपीवी के जरिए शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त करना था। इस कार्यक्रम के तहत पूरे मुल्क में पांच साल से कम उम्र के सभी बच्चों को साल में दो बार यानी, दिसंबर और जनवरी महीने में ओरल पोलियो टीके की खुराकें दी गईं। पोलियो टीके की दो खुराक पीने वाले बच्चों में तीनों तरह के पोलियो वायरस के खिलाफ सुरक्षात्मक एंटीबॉडी बन जाती है और 99 फीसदी बच्चे तीन खुराकों के बाद सुरक्षित हो जाते हैं। शुरुआत में इस कार्यक्रम की राह में काफी अड़चनें आईं। भारत जैसे विशाल आबादी और क्षेत्रफल वाले देश में हर बच्चे को दो बूंद जिंदगी की पिला पाना एक मुश्किल चुनौती थी। सरकार ने अपनी मुहिम को कामयाब बनाने के लिए न सिर्फ स्वास्थ्य महकमे और स्वयंसेवी संस्थाओं का सहारा लिया, बल्कि अपने कई महकमों के हजारों कर्मचारियों को भी इसमें झोंक दिया। कोई 23 लाख स्वयंसेवी विषम परिस्थितियों में भी घर-घर जाकर पांच साल उम्र तक के बच्चों को पोलियो की दवा पिलाते रहे। एक बात और। अशिक्षा, अंधविश्र्वास और अज्ञानता की वजह से एक बड़ी आबादी ने पहले इस कार्यक्रम से किनाराकशी की। पोलियो टीकाकरण के बारे में कुछ समाजों के अंदर कई गलतफहमियां और भ्रांतियां थीं, जिसके चलते वे अपने बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाने को तैयार नहीं होते थे। लेकिन सरकार ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और लगातार अपनी कोशिशें जारी रखीं। उसने इसके लिए राष्ट्रव्यापी प्रचार अभियान छेड़ा और घर-घर जाकर बच्चों को पोलियोरोधी ड्राप्स पिलाए। तब जाकर आज मुल्क इस मुकाम पर पहुंचा है। बहरहाल, पोलियो के खिलाफ इतनी बड़ी कामयाबी मिलने के बाद भी भारत के लिए चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। यह आधी उपलब्धि है और पूरी उपलब्धि अभी बाकी है। पोलियो मुक्त मुल्क का दर्जा पाने के लिए अगले दो सालों तक भारत को पोलियो मुक्त रहना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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नदियों को जोड़ने की चुनौती



नदियों को जोड़ने की चुनौती
- (नदियों को जोड़ने की अत्यंत महत्वाकांक्षी परियोजना के समुचित क्रियान्वयन पर संदेह जता रहे हैं ब्रह्मा चेलानी)
 
राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना 37 हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों को आपस में जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना है। कभी राहुल गांधी ने इसकी खिल्ली उड़ाई थी, अब सुप्रीम कोर्ट ने इसके समयबद्ध क्रियान्वयन का आदेश जारी किया है। सवाल यह है कि क्या यह संभव होगा? नर्मदा परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट के रुख के आलोक में इस मामले में उम्मीद बंधती है। भारत में सरकार विशाल जल परियोजनाएं तो लाती है, किंतु विस्थापितों की पुनस्र्थापना और प्रभावशाली नागरिक समाज समूहों के कड़े विरोध से आंखें मूंद लेती है। विदेशी पूंजी पर चलने वाले एनजीओ स्थानीय निवासियों के विस्थापन के मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हैं। इस प्रकार के संगठन अनेक जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में अपना शक्ति प्रदर्शन कर चुके हैं। औद्योगिकीकरण की मांग स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव डाल रही है। ऐसे में एनजीओ और नागरिक समूहों ने ऐसे उद्योगों का विरोध तेज कर दिया है जिनमें पानी की अधिक मात्रा में खपत होती है। भारत की लौह अयस्क पट्टी में लग्जमबर्ग के आर्सेलर मित्तल और दक्षिण कोरिया के पोस्को समूह की परियोजनाओं के जबरदस्त विरोध के कारण इन परियोजनाओं में देरी इसका ताजा उदाहरण है। बांध विरोधी मेधा पाटकर और अरुंधति रॉय को अनेक परियोजनाओं के विरोध में जोरदार समर्थन मिला है। जनता के दबाव में आकर 2010 में सरकार ने भागीरथी नदी पर तीन निर्माणाधीन परियोजनाओं पर काम रोक दिया था। इस कारण करोड़ों रुपये पानी में डूब गए थे। इस पृष्ठभूमि में वाजपेयी सरकार के नदियों को जोड़ने के कदम की असाधारण प्रकृति का पता चलता है। यह एक स्वप्निल योजना है। 12,500 नहरों के माध्यम से 178 अरब घनमीटर की विशाल जलधाराओं से साढ़े तीन करोड़ हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने और 34 गीगावाट पनबिजली के उत्पादन का लक्ष्य है। यह ऐसी योजना है जो चीन जैसा अधिसत्तात्मक देश ही शुरू और क्रियान्वित कर सकता है। इसलिए इसमें जरा भी आश्चर्य नहीं है कि भारत का नदी जोड़ो कार्यक्रम कई साल तक योजना के स्तर पर ही अटका रहा। राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम को विनाशकारी विचार कहकर खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि यह योजना देश के पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। भारत की सत्ताधारी पार्टी के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के इस बयान से प्रभावित होकर तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसे मानव, आर्थिक और पारिस्थितिक विनाश बताया था। बाद में राहुल गांधी ने इस परियोजना के छोटे से भाग केन और बेतवा नदी को जोड़कर सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात की थी। केन और बेतवा को 231 किलोमीटर लंबी नहर के माध्यम से जोड़ने की योजना पर्यावरण को नुकसान की आशंका के कारण खटाई में पड़ गई। असलियत यह है कि 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार की योजना शुरू करने के लिए सरकार को प्रोत्साहित किया था। यह भी सच है कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन होने के बाद यह योजना दलगत राजनीति की भेंट चढ़ गई और नई सरकार को पुरानी सरकार के फैसले में खोट दिखाई देने लगा। 2009 में संप्रग सरकार ने संसद को बताया था कि नदी जोड़ने की इस परियोजना में भारी खर्च होगा और सरकार के पास इस मद के लिए इतनी राशि नहीं है। सरकार ने इस बात पर गौर नहीं किया कि नदियों को आपस में जोड़ने से भारत का खाद्यान्न उत्पादन दोगुना बढ़कर 45 करोड़ टन वार्षिक हो जाएगा और बढ़ती आबादी और संपन्नता के कारण खाद्यान्न की बढ़ती मांग की आसानी से पूर्ति हो जाएगी। यह भी काबिलेगौर है कि मानसून के मौसम में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदियों के बेसिन में बाढ़ आ जाती है, जबकि पश्चिमी भारत और प्रायद्वीपीय बेसिनों में पानी की कमी हो जाती है। इन तमाम बेसिनों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने, बाढ़ से बचने और खाद्यान्न बढ़ाने के लिए इंडियन वाटर डेवलपमेंट एजेंसी ने अंतर बेसिन जल स्थानांतरण (आइबीडब्ल्यूटी) को ही एकमात्र उपाय बताया था। नई कृषि प्रौद्योगिकी और नए प्रकार के बीज मिलने के बाद भी 45 करोड़ टन वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन के लिए सरकार को सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना होगा। अन्यथा, खाद्यान्न आयात पर बढ़ती निर्भरता से पीछा नहीं छूटेगा। यह सत्य है कि विश्व के अनेक भागों में अंतर बेसिन जल स्थानांतरण सफलता के साथ क्रियान्वित हो रहा है। चीन की दक्षिण-उत्तर जल परियोजना विश्व की सबसे विशाल अंतर बेसिन जल स्थानांतरण पहल है, किंतु भारत चीन नहीं है, जहां लोकतंत्र का अभाव बड़े परिवर्तनों के लिए लाभ की स्थिति है। भारत ने बार-बार दर्शाया है कि उसमें दीर्घकालिक सामरिक योजनाएं बनाने और उन्हें सफलतापूर्वक क्रियान्वित करने की क्षमता नहीं है। जब भारत को नर्मदा नदी परियोजना को पूरा करने में ही दशकों का समय लग गया तो यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह नदी जोड़ो जैसी विशाल परियोजना क्रियान्वित कर सकता है? नदी जोड़ो योजना का बांग्लादेश पर प्रभाव पड़ना तय है। वह इस परियोजना को लेकर पहले ही चिंतित है। सीधा सा तथ्य यह है कि एनजीओ द्वारा संगठित विरोध के कारण परियोजनाओं को रोकना पड़ रहा है। ऐसा अनेक पनबिजली परियोजनाओं के साथ हो चुका है। इस कारण निजी-सार्वजनिक निवेश को लेकर उत्साह नहीं है। परिणामस्वरूप, पनबिजली का आकर्षण खत्म होता जा रहा है, जबकि देश के हिमालयी भाग में विपुल पनबिजली उत्पादन की गुंजाइश है। भारत के कुल विद्युत उत्पादन में पनबिजली की हिस्सेदारी 1962-63 में 50 फीसदी से घटकर 2009-10 में 23 प्रतिशत रह गई है। पनबिजली के उत्पादन को बढ़ावा देने के केंद्र सरकार के प्रयासों के बावजूद विरोध प्रदर्शन, पर्यावरण चिंताओं, भूमि अधिग्रहण पर अनावश्यक कानूनी कार्रवाई और राज्य सरकारों द्वारा पेशगी प्रीमियम राशि की मांग पर मामला फंस जाता है। नर्मदा पर बिजलीघर बनाने की योजना आजादी के तुरंत बाद बन गई थी, किंतु यह अब तक पूरी तरह क्रियान्वित नहीं हो सकी है, जबकि चीन ने 18,300 मेगावाट की क्षमता वाला थ्री जॉर्ज बांध निर्धारित समय से पहले ही बना दिया। यह परियोजना नर्मदा परियोजना से साढ़े बारह गुनी बड़ी है। नर्मदा बांध में लालफीताशाही, कानूनी अड़चन और राजनीतिक व एनजीओ कार्यकर्ताओं द्वारा बाधाएं खड़ी करने से यह साबित हो जाता है कि कोई भी बड़ी परियोजना शुरू करना बेहद मुश्किल काम है। जिस प्रकार भारत के पास कोई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति नहीं है उसी प्रकार इसके पास कोई राष्ट्रीय जल सुरक्षा नीति भी नहीं है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

पश्चिमी देशों की कठपुतली बनते एनजीओ




पश्चिमी देशों की कठपुतली बनते एनजीओ
--प्रमोद भार्गव
 
हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सनसनी के लिए कभी कुछ नहीं बोलते। सधी वाणी में सीमित शब्द बोलने के कारण ही उनके बयान बेवजह सुर्खियों का हिस्सा नहीं बनते। अमेरिका की उदारवादी नीतियों और स्वयंसेवी संगठनों के कमोवेश पैरोकार रहे प्रधानमंत्री दोनों को कठघरे में खड़ा करेंगे, यह थोड़ी हैरानी में डालने वाली बात जरूर है। लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में औद्योगिक विकास को लगते झटके और लगातार गिरती विकास दर भी है। प्रधानमंत्री ने साइंस पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा है कि कुछ एनजीओ भारत की ऊर्जा जरूरतों की कद्र नहीं कर रहे। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों से मिलने वाली आर्थिक मदद का इस्तेमाल कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना के विरुद्ध मुहिम चलाने में कर रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह असाधारण और आश्चर्यजनक बयान गृह मंत्रालय के उस जांच प्रतिवेदन पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि कुछ एनजीओ धर्मार्थ और जन कल्याणार्थ मिले विदेशी धन का इस्तेमाल परमाणु खतरों के बहाने लोगों को परियोजना के खिलाफ भड़काने में कर रहे हैं। बता दें कि कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र रूस के सहयोग से स्थापित किया जा रहा है। इसलिए कूटनीति के कुटिल खिलाड़ी अमेरिका के प्रति उठे संदेह को एकाएक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन संगठनों के मूलभूत उद्देश्य भले ही जन कल्याण हों, लेकिन इनकी पृष्ठभूमि में अंतत: अमेरिका के व्यावसायिक हितों को साधना ही सर्वोच्च लक्ष्य है।
 राह से भटके एनजीओ
आधुनिक या नवीन स्वयंसेवी संगठनों को सरकार की जटिल शासन प्रणाली के ठोस विकल्प के रूप में देखा गया था। उनसे उम्मीद थी कि वे एक उदार और सरल कार्यप्रणाली के रूप में सामने आएंगे। चूंकि सरकार के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि वह हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान कर सके। इस परिप्रेक्ष्य में विकास संबंधी कार्यक्रमों में आम लोगों की सहभागिता की अपेक्षा की जाने लगी और उनके स्थानीयता से जुड़े महत्व व ज्ञान परंपरा को भी स्वीकारा जाने लगा। वैसे भी सरकार और संगठन दोनों के लक्ष्य मानव के सामुदायिक सरोकारों से जुड़े हैं। समावेशी विकास की अवधारणा भी खासतौर से स्वैच्छिक संगठनों के मूल में अतर्निहित है। बावजूद प्रशासनिक तंत्र की भूमिका कायदे-कानूनों की संहिताओं से बंधी है। लिहाजा, उनके लिए मर्यादा का उल्लंघन आसान नहीं होता। जबकि स्वैच्छिक संगठन किसी आचार संहिता के पालन की बाध्यता से स्वतंत्र हैं। इसलिए वे धर्म और सामाजिक कार्यो के अलावा समाज के भीतर मथ रहे उन ज्वलंत मुद्दों को भी हवा देने लग जाते हैं, जो उज्जवल भविष्य की संभावनाओं और तथाकथित परियोजनाओं के संभावित खतरों से जुड़े होते हैं। कुडनकुलम परियोजना के विरोध में लगे जिन विदेशी सहायता प्राप्त संगठनों की नाक में नकेल डाली गई है, वे इस परियोजना के परमाणु विकिरण संबंधी खतरों की नब्ज को सहला कर अमेरिकी हित साधने में लगे थे, जिससे रूस के रिएक्टरों की बजाय अमेरिकी रिएक्टरों की खरीद भारत में हो। ऐसे छद्म संगठनों की पूरी एक श्रंृखला है, जिन्हें समर्थक संस्थाओं के रूप में देसी-विदेशी औद्योगिक घरानों ने पाला-पोषा। चूंकि इन संगठनों की स्थापना के पीछे एक सुनियोजित मंशा थी, इसलिए इन्होंने कॉरपोरेट एजेंट की भूमिका निभाने में कोई संकोच नहीं किया, बल्कि आलिखित अनुबंध को मैदान में क्रियान्वित किया।
मदद का बेजा
 इस्तेमाल देसी या विदेशी सहायता नियमन अधिनियम के चलते राजनीति से जुड़े दल विदेशी आर्थिक मदद नहीं ले सकते, लेकिन स्वैच्छिक संगठनों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं है। इसलिए खासतौर से पश्चिमी देश अपने मंसूबे साधने के लिए उदारता से भारतीय गैरसरकारी संगठनों को अनुदान देने में लगे हैं। ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड, स्विटजरलैंड, कनाडा, स्पेन, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, फ्रांस, ऑस्टि्रया, फिनलैंड और नार्वे जैसे देश दानदाताओं में शामिल हैं। आठवें दशक में गैरसरकारी संगठनों को समर्थ व आर्थिक रूप से संपन्न बनाने का काम काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन (कपार्ट) ने भी किया। कपार्ट ने ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार, महिला कल्याण, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा साक्षरता, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए संगठनों को दान में धन देने के द्वार खोल दिए। पर्यावरण संरक्षण और वन विकास के क्षेत्रों में भी इन संगठनों की भूमिका रेखांकित हुई। भूमंडलीय परिप्रेक्ष्य में नव उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में आगमन का सिलसिला परवान चढ़ने के बाद तो जैसे एनजीओ के दोनों हाथों में लड्डू आ गए। खासतौर से दवा कंपनियों ने इन्हें काल्पनिक महामारियों को हवा देने का जरिया बनाया। एड्स, एंथ्रेक्स और व‌र्ल्ड फ्लू की भयावहता का वातावरण रचकर एनजीओ ने ही अरबों-खरबों की दवाएं और इनसे बचाव के नजरिए से तमाम उपायों के लिए बाजार और उपभोक्ता तैयार करने में उल्लेखनीय, किंतु छद्म भूमिका का निर्वहन किया। चूंकि ये संगठन विदेशी कंपनियों के लिए बाजार तैयार कर रहे थे, इसलिए इनके महत्व को सामाजिक गरिमा प्रदान करने की चालाक प्रवृत्ति के चलते संगठनों के मुखियाओं को न केवल विदेश यात्राओं के अवसर देने का सिलसिला शुरू हुआ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता देते हुए इन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित विश्व सम्मेलनों व परिचर्चाओं में भागीदारी के लिए आमंत्रित भी किया जाने लगा। इन सौगातों के चलते गैरसरकारी संगठनों का अर्थ और इनकी भूमिका दोनों बदल गए। जो सामाजिक संगठन लोगों द्वारा अवैतनिक कार्य करने और आर्थिक बदहाली के पर्याय हुआ करते थे, वे वातानुकूलित दफ्तरों और लग्जरी वाहनों के आदी हो गए। इन संगठनों के संचालकों की वैभवपूर्ण जीवन शैली में अवतरण के बाद उच्च शिक्षित, चिकित्सक, इंजीनियर, प्रबंधक तथा अन्य पेशेवर लोगों इनसे जुड़ने लगे। इन वजहों से इन्हें सरकारी विकास एजेंसियों की तुलना में अधिक बेहतर और उपयोगी माना जाने लगा। देखते-देखते दो दशक के भीतर ये संगठन सरकार के समानांतर एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े हो गए, बल्कि विदेशी धन और संरक्षण मिलने के कारण ये न केवल सरकार के लिए चुनौती साबित हो रहे हैं, बल्कि आंख दिखाने का काम भी कर रहे हैं। कुडनकुलम परियोजना का विरोध इसी मानसिकता का परिचायक है।
नकेल कसने की कवायद
हालांकि नई दिल्ली में रूस के राजदूत एलेक्जेंडर काडकिन पहले ही एनजीओ की साजिश की ओर इशारा कर चुके थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान आने के बाद रूस के प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन भी मनमोहन सिंह के साथ खड़े हो गए हैं। उन्होंने साफ किया है कि स्वयंसेवी संगठन दूसरे देशों में अस्थिरता पैदा करने के काम में लगे हैं। लिहाजा, उनके खिलाफ ठोस कानूनी कार्रवाई की जरूरत है। यहां गौरतलब यह भी है कि पुतिन और मनमोहन सिंह ठीक उस वक्त मुखर हुए हैं, जब मिस्र में अमेरिका से आर्थिक सहायता प्राप्त एनजीओ के कार्यकर्ताओं के खिलाफ अदालती कार्रवाई शुरू हुई है। परोपकार और जरूरतमंदों की सहायता भारतीय दर्शन और संस्कृति का अविभाज्य हिस्सा है, लेकिन वर्तमान स्वैच्छिक संगठनों को देसी-विदेशी धन के दान ने इनकी आर्थिक निर्भरता को दूषित तो किया ही, इनकी कार्यप्रणाली को भी अपारदर्शी बना दिया है। इसलिए ये विकारग्रस्त तो हुए ही, अपने बुनियादी उद्देश्यों से भी भटक गए। कुडनकुलम में जिन संगठनों पर कानूनी शिकंजा कसा गया है, उन्हें धन तो विकलांगों की मदद और कुष्ठ रोग उन्मूलन के लिए मिला था, लेकिन इसका दुरुपयोग वे परियोजना के खिलाफ लोगों को उकसाने में कर रहे थे। लिहाजा, सरकार की कार्रवाई को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता। अब जरूरत है कि सरकार एक कदम आगे बढ़कर जहां-जहां भी इन परियोजनाओं का विरोध हो रहा है, वहां सक्रिय स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका की पड़ताल कर उन पर शिकंजा कसे, जिससे परियोजनाएं और औद्योगिक विकास बाधित न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
 
 
पैसे के लिए ये कुछ भी करेंगे
-- ज्ञानेंद्र रावत
गैरसरकारी संगठनों यानी एनजीओ की विश्वसनीयता पर लंबे अरसे से सवाल उठते रहे हैं और इस क्षेत्र में सुधार की मांग भी होती रही है। आज जबकि ऐसे संगठन सुरसा के मंुह की तरह बढ़ रहे हैं और खूब फल-फूल रहे हैं, उस हालत में इनकी कार्यप्रणाली पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि आज गैरसरकारी संगठन चलाना एक कारोबार हो गया है। अलग-अलग नाम से संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन करवाकर विदेशों से या देश के सरकारी विभागों से अनुदान हासिल करना, कागजों में ऊल-जलूल खर्च दिखाकर उसे आपस में बांट लेना एक पेशा हो गया है। यही कारण है कि सरकारी विभागों की तरह गैरसरकारी संगठनों पर भी उंगलियां उठने लगीं और इनकी विश्वसनीयता को ही कटघरे में खड़ा किया जाने लगा। एनजीओ के विस्तार की परिस्थितियों पर नजर डालें तो पता चलता है कि साठ और सत्तर के दशकों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से समाज में स्वैच्छिक कार्यो की भावना जाग्रत करने के लिए संस्थागत प्रयासों को महत्ता दी गई। इसके लिए पूर्व में कार्यरत सामाजिक संगठन या फिर नव गठित संगठनों-संस्थाओं को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई और उनके लिए अनुदान के द्वार खोल दिए गए। उन्हें इन कामों के लिए जबरदस्त आर्थिक मदद दी गई। इस मदद का इन संगठनों ने मनचाहा इस्तेमाल भी किया। इसकी एक वजह यह भी थी कि ये जनता के प्रति जवाबदेह नहीं थे, बल्कि वे तो दानदाता एजेंसियों के प्रति ही जवाबदेह रहे। जनकल्याण के काम पूरे करने या यों कहें कि उन कार्यो की पूर्णता दानदाता एजेंसियों को दिखाना ही इनका एकमात्र मकसद रहा। इसके बाद नई योजना के लिए नया प्रयास और फिर एक नए दानदाता की तलाश। एनजीओ काम करें या न करें, लेकिन जनता के बीच ढिंढोरा पीटने में कभी पीछे नहीं रहे। इससे इन्हें प्रशंसा और प्रतिष्ठा मिली। जनता के प्रति जवाबदेह न होते हुए भी कहीं-कहीं तो वे जनता के बीच भगवान भी कहलाए जाने लगे। कारण पीने का पानी मुहैया कराना, अच्छे स्कूलों के माध्यम से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराना, किसानों को खेती का विस्तार, उसके लिए तकनीकी ज्ञान प्रदान करना, पर्यावरण सुधार, जीवों की सुरक्षा आदि यानी जो जिन कार्यो की जिम्मेदारी सरकार की थी, एनजीओ द्वारा किये जाने लगे, जिससे जनता में इनकी पहचान बनी। दूसरी तरफ सरकार से मोह भंग होता गया। यही कुछ कारण हैं, जो इनके विस्तार के अहम कारण रहे। लिहाजा, आज कॉरपोरेट सेक्टर में भी इन पेशेवर स्वयंसेवकों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। इस पर अंकुश लगा पाना आज सरकार के बूते के बाहर की बात है। जहां तक एनजीओ की कार्यप्रणाली पर निगरानी का सवाल है तो जो एनजीओ विदेशी सहायता से चलाए जा रहे हैं, उनकी निगरानी के लिए विदेशी दान नियमन कानून है। फिर विदेशी सहायता देने वाली संस्थाएं अपने दिए धन के इस्तेमाल की जांच-परख भी करती हैं। यह और बात है कि उन्हें संतुष्ट करने में हमारे भारतीयों को महारत हासिल है। लेकिन गैरसरकारी संगठनों को जिन योजनाओं के लिए सरकारी पैसा मिलता है, उसके बारे में जानने का हक तो जनता को है ही। आखिर वह पैसा हम टैक्स के रूप में चुकाते हैं। कुछ अरसा पहले उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी ने कहा था कि मुनाफा नहीं कमाने वाली संस्थाओं, गैरसरकारी संगठनों, ट्रस्टों आदि का भी सीएजी द्वारा ऑडिट कराया जाना चाहिए। मगर इसके लिए ब्रिटेन की तरह राज्य स्तरीय चैरिटी कमीशन की स्थापना जरूरी है ताकि नागरिक समाज से संबंध बनाए रखने के लिए कानूनी नियम और नीतियां बनाई जा सकें। यह तभी संभव है, जबकि सरकार सजग प्रहरी की भूमिका निभाए और जनता जागरूक रहकर इन पर नजर रखे। अब देखना यह है कि सरकार ने विदेशी सहायता नियामक अधिनियम 1976 में संशोधन करके नए कानून का जो मसौदा तैयार किया है, वह कब तक कानूनी रूप अख्तियार करेगा। प्रस्तावित कानून के मुताबिक सरकारी अधिकारी, जन प्रतिनिधि, राजनीतिक दलों के दफ्तरों में काम करने वाले, जज आदि सामाजिक कार्यो के नाम पर विदेशी सहायता हासिल नहीं कर पाएंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Friday, March 2, 2012


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