Thursday, April 11, 2013

Indian calender is Best in all worlds calender




श्रेष्ठतम कालगणना का प्रतीक भारतीय नववर्ष


भारत का दुर्भाग्य है कि एक जनवरी आते ही नववर्ष की शुभकामनाओं का तांता लग जाता है किन्तु अपने नव संवत्सर पर गर्व करने में हमें संकोच लगता है। जबकि भारतीय कालगणना का विश्व में मुकाबला नहीं हैं। क्योंकि यह कालगणना ग्रह नक्षत्रों की गति पर आधारित है। यहां प्रत्येक मास में पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, उसी नाम पर भारतीय महीनों का नाम रखा गया है। चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा नक्षत्र के आधार पर वैशाख, ज्येष्ठा नक्षत्र के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के आधार पर आषाढ़, श्रवण नक्षत्र के आधार पर श्रावण, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के आधार पर भाद्रपद, अश्विनी नक्षत्र के आधार पर आश्विन, कृतिका नक्षत्र के आधार पर कार्तिक, मृगशिरा नक्षत्र के आधार पर मार्गशीर्ष, पुण्य नक्षत्र के आधार पर पौष, मघा नक्षत्र के आधार पर माघ, उत्तर-फाल्गुनी नक्षत्र के आधार पर फाल्गुन मास निर्धारित है। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण की वर्षों पूर्व की कालगणना भारतीय पंचांग में है। फिर भी विक्रमी संवत् पर गर्व करने में संकोच क्यों? कुछ दिन पूर्व शताब्दी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण हुआ। भारतीय ज्योतिष के विद्वानों ने बहुत पहले से बताना प्रारंभ कर दिया कि अमुक दिन, अमुक समय सूर्यग्रहण होगा। किन्तु यूरोपीय विद्वानों ने अविश्वास का वातावरण बनाना प्रारंभ कर दिया। भारी शोध के बाद नासा ने पता किया कि भारतीय ज्योतिष में जो कहा गया है, वही ठीक है। किन्तु आगे ही गणनायें ठीक होंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है, याने फिर से एक अविश्वास की रेखा।
अपनी कालगणना का हम सतत स्मरण करते हैं किन्तु हमें ध्यान नहीं रहता है। जब हम किसी नये व्यक्ति से मिलते हैं तो उसे अपना परिचय देते हैं कि अमुक देश, प्रदेश, या गांव के निवासी हैं, अमुक पिता की संतान है। इसी प्रकार जब हम किसी शुभ कार्य का संपन्न करन के लिए किसी देव शक्ति का आवाहन करते हैं तो उसे संकल्प करते समय अपना परिचय बताते हैं। संकल्प के समय पुरोहितगण एक मंत्र बोलते हैं, जिस पर हम विशेष ध्यान नहीं देते किन्तु उस संकल्प मंत्र में जो कहा गया है उसमें हमारी कालगणना भी है। मंत्रोच्चार कुछ इस प्रकार से है- ऊं अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवर्त्य मानस ब्राह्मणों द्वितीय परार्द्धे, श्वेत वाराह कल्ये, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बू द्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुक गोत्र आदि... पूजनं/आवहनम् करिष्यामउहे। मंत्र में स्पष्ट है कि हय ब्रहमा जी आयु के दो परार्द्धों में से यह द्वितीय परार्द्ध है। इस समय श्वेत वाराह कल्प चल रहा है। कल्प को ब्रहमा जी आयु का एक दिन माना गया है किन्तु यह कालगणना की इकाई भी है। एक कल्प में 14 मनवन्तर, 1 मनवन्तर में 71 चतुर्युग तथा एक चतुर्युग में 43 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं जिसका 1/10 भाग कलियुग, 2/10 भाग द्वापर, 3/10 भाग त्रेता तथा 4/10 भाग सतयुग होता है। इस समय सातवें वैवस्वत नामक मनवंतर का अट्ठाईसवां कलियुग है। हमें स्मरण होगा कि महाभारत का युद्ध समाप्त होने के 36 वर्षों बाद भगवान श्रीकृष्ण ने महाप्रयाण किया। यह घटना ईस्वी सन प्रारंभ होने से 3102 वर्ष पहले की है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण भगवान के दिवंगत होते ही कलियुग प्रारंभ हो गया अर्थात ईस्वी सन् 2013 में कलियुग को प्रारंभ हुये 5115 वर्ष हो गये। जिसे युगाब्द या कलि संवत कहते हैं। बृह्म पुराण में भी लिखा गया है कि यही वह दिन है जब बृह्मा जी ने सृष्टि की रचना की है।
'चैत्र मासे जगद्बृह्मा ससर्ज पृथमेतऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति।।'
इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने श्रेष्ठ राज्य की स्थापना की। इसी कारण विक्रम संवत भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारंभ होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा जिस वार को होती है वही संवत् का राजा होता है तथा जिस वार को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है वह संवत् का मंत्री होता है। सूर्य की अन्य संक्रांतियों द्वारा वर्ष की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्थितियों का निर्धारण होता है। क्या अन्य किसी कालगणना में इतनी सूक्ष्म व्याख्या है? उत्तरी भारत में तो होली के बाद संवत सुनने की परम्परा को पुण्यदायी माना गया है। पुरोहित गण संवत सुनने से गंगा के स्नान के समान फल मिलने की बात कहते है। यही संवत भारतीय समाज के पर्व, त्योहारों, वैवाहिक संस्कारों समेत समस्त संस्कारों की रीढ़ है।
सारी श्रेष्ठताओं के बाद भी विक्रमी संवत भारत का राष्ट्रीय पंचांग नहीं बन सकता यह स्वाभाविक कौतूहल का विषय है। सन् 1996 तक तो हम संसद में आम बजट भी अंग्रेजों के समयानुसार शाम को 5 बजे प्रस्तुत करते थे। जबकि 5 बजे संसद व अन्य सरकारी कार्यालय बंद होने का समय निर्धारित किया गया है। लेकिन ऐसा हमने अंग्रेजों को खुश करने के लिए किसी जमाने में किया था। क्योंकि जब भारत में शाम का 5 बजता है तो इंग्लैंड में दिन का साढ़े ग्यारह बजता है। हम इंग्लैंड की घड़ी से बजट पेश करते थे, इतना ही नहीं ऐतिहासिक शब्दावली में ईसा से पूर्व (बीसी) तथा ईसा के बाद (एडी) शब्दों का प्रयोग करने लगे। अर्थात हमारी समय गणना का आधार ईसा मसीह हो गये, इसे हम आजादी के सातवें दशक में भी बदल नहीं पाए क्योंकि आज़ाद हिंदुस्तान का पहाल गवर्नर जनरल माउंटबेटन को बनाया गया। उन्होंने हमारी ओर से भारत के प्रथम राष्ट्राध्यक्ष के रूप में किंग जार्ज के प्रति वफादारी की शपथ ली, इसी कारण 14/15 अगस्त की मध्यरात्रि को अंसख्य शहीदों के बलिदानों को धूल धूसरित का ब्रिटिश झण्डा सलामी देकर सम्मानपूर्वक उतारा गया। अंग्रेजियत में रचे बसे पंडित नेहरू के हाथ में देश की बागडोर तो आ गयी किन्तु इंडियावादी दृष्टि से भारत को मुक्ति नहीं मिल सकी।
उसी का परिणाम था कि जब 1952 में प्रो0 मेघनाद शाहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनी तो उसने भी भारतीयता को आगे बढ़ने से रोक दिया। भले ही प्रो0 साहा ने पंचाग का निर्धारण करते समय कहा था कि वर्ष का आरम्भ किसी खगोलीय घटना से होना चाहिए। उन्होंने ग्रेगेरियन कैलेण्डर के विभिन्न महीनों में दिनों की संख्या में असंगतता पर सवाल भी उठाये थे किन्तु जन पंचाग सुधार समिति की रिपोर्ट देश के सामने आयी तो पता चला कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयुक्त मानकर शक संवत् को राष्ट्रीय पंचाग तथा ग्रेगेरियन कैलेण्डर को अन्तरराष्ट्रीय कैलेण्डर के रूप में मान्यता दे दी गयी। वस्तुतः समिति का यह कुकृत्य भी इण्डियावादी दृष्टिकोण को ही प्रकट करता है। शंक संवत् ग्रेगेरियन कैलेण्डर से 79 वर्ष छोटा है तथा विक्रम संवत 57 वर्ष बड़ा है। ऐसी स्थिति में यदि विक्रम संवत को समिति राष्ट्रीय पंचाग मानती तो अंग्रेजों के नाराज होने का खतरा था।
वैसे भी शक संवत् नितांत अवैज्ञानिक है जिसका प्रथम दिन ही तय करने के लिये ग्रेगेरियन कैलेण्डर का सहारा लिया गया। शक संवत् में वर्ष का आंरभ 22 मार्च से होता है। वर्ष में कुल 365 दिन है जबकि लीप वर्ष में 366 दिन होते हैं। यही व्यवस्था ग्रेगेरियन कैलेण्डर में भी है। इस शक संवत् में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण एवं भाद्रपद याने प्रारंभ के 6 महीने 3+31 दिनों के तथ आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ एवं फाल्गुन याने बाद के 6 महीने 30-30 दिनों तय कर दिये गये। लीप वर्ष में वर्ष का आरंभ 21 मार्च से ही माना जायेगा। यही चैत्र का प्रथम दिन भी होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसा मन में आ जाये वैसा ही लिख दिया जाय भले ही लिखने का कोई आधार हो या न हो। लीप वर्ष के अलावा चैत्र भी 30 दिन का है। लगभग यही स्थिति ग्रेगेरियन कैलेण्डर की भी है। उसका भी वैज्ञानिकता से दूर दराज का कोई रिश्ता नहीं है। इन दोनों पंचागों में 365 दिन 6 घंटे का हिसाब तो है किन्तु 9 मिनट 11 सेकेंड का कोई हिसाब नहीं जबकि पृथ्वी अपनी धुरी पर इतने ही समय में सूर्य का एक चक्कर लगाती है।
ग्रेगेरियन कैलेण्डर का मुख्य आधार रोमन का कैलेण्डर है जो ईसा से 753 साल पहले चला था उसमें 10 माह तथा 304 दिन थे। उसी के आधार पर सितम्बर 7वां, अक्टूबर आठवां, नवम्बर नवां तथा दिसम्बर 10वां महीना था। 53 साल बाद वहां के शासक नूमा पाम्पी सियस ने जनवरी और फरवरी जोड़कर 12 महीने तथा 355 दिनों का रोमन वर्ष बना दिया तथा अत्यंत हास्यापद तरीके से सितंबर 9वां, अक्टूबर 10वां, नवम्बर 11वां तथा दिसम्बर 12वां महीना हो गया तो आज तक चल रहा है। ईसा के जन्म से 46 साल पहले जूलियस सीजर ने रोमन वर्ष 365 दिनों का कर दिया। 1582 ई. में पोप ग्रेगरी ने आदेश करके 4 अक्टूबर को 14 अक्टूबर कर दिया। मासों में दिनों का निर्धारण भी मनमाने तरीके से बिना क्रमबद्धता को ध्यान रखे हुये कर दिया गया। किंतु इन सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन्ही पंचागों को हमने सर्वश्रेष्ठ मानकर स्वीकार कर लिया। इसी प्रकार इस्लामिक कालगणना भी असंगतता से भरपूर है। पता ही नहीं कि रमजान का महीना कौनसा होगा, कब होगा।






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