Thursday, June 10, 2010

डाकिया-Postman


डाकिया

वल्लभ डोंगरे
अब कम ही दिखाई देता है डाकिया
जो रोज-रोज आता था घंटी बजाता था
ढेरों चिट्ठियां बिखेर जाता था
घर-आंगन में अब कम ही दिखाई
देता है डाकिया

उसका आगमन हमारे अरमानों,

खुशियों का आगमन था
उसका आगमन दोस्त-रिश्तेदारों की
खबरों का आगमन था,
उसका आगमन बिटिया की चिट्ठी
उसके सुख-दुख की खबर होती थी,
उसका आगमन बेटे की चिट्ठी होती थी
जो दूर शहर में पढ़ता था
उसका आगमन मां-बाबा की
खुशियों का आगमन था
जो बेटे-बेटियों की चिट्ठियों से
खुश हो लेते थे
उसका आगमन भाई-बहन का
प्यार होता था
उसका आगमन बेटे की नौकरी
लगने की खबर होती थी
उसका आगमन होती थी
होली, दिवाली, ईद की शुभकामनाएं
पर अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया

मेरी उम्र के साथ बुढ़ा गया लगता है

डाकिया
बुढ़ा गई लगती हैं भावनाएं-संवेदनाएं
तभी तो अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया
बारिश की फुहार की तरह
आज भी जब कभी कर जाता है
डाकिया

चिट्ठी-पत्री की फुहार घर-आंगन में

तो माटी की सौंधी गंध घुल जाती है
वातावरण में हो जाता है तरोताज़ा तन-मन
अब कम ही दिखाई देता है
डाकिया
जो रोज-रोज आता था घंटी बजाता था
ढेरों चिट्ठियां बिखेर जाता था
घर-आंगन में।


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